भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

हित चौरासी • • ६६

  • ५ - अवतरण-प्रातः पावन समीरण बह रहा है। समस्त वन खग-वृन्द कलरव से मुखरित है। यमुना तटवर्ती ललित लता मन्दिर से निकल कर रसिक युगल किशोर गल बहियाँ दिये झूमते डगमगाते से चले आ रहे हैं उनींदे नयन बार-बार झँप जाते हैं। वस्त्र एवं भूषण शिथिल हैं, कहीं कपोलों पर पीक है तो कहीं नयनों में मलिन मषि रेखा है। उर पर खण्डित मालावलि शोभित हैं। वस्त्र पलट चुके हैं, प्रियाजी के श्रीअंग में पीताम्बर की शोभा है और प्रियतम के नीलाम्बर की। श्रीअंग में ललिता, विशाखादि सखियाँ चँवर व्यजन ढुराती चल रहीं हैं, बीच बीच में युगल के विगलित वस्त्राभरणों को सम्हाल भी देती हैं। कुछ प्रशंसा परायण सहचरियाँ अपने कोकिल कण्ठ से मधुर मधुर विभास गाती हैं। गान वर्णित भाव का लक्ष्य अपनी ओर समझकर युगल एक दूसरे की ओर देखकर मुसकुराते और फिर प्रेमलज्जा से भर जाते हैं छटा का वर्णन श्रीहित हरिवंश जी इस प्रकार करते हैं राग विभास मूल-आजु प्रभात लता मंदिर में, सुख वरषत अति हरषि जुगल वर। गौर स्याम अभिराम रंग भरे, लटकि लटकि पग धरत अवनि पर॥ कुच कुमकुम रंजित मालावलि, सुरत नाथ श्रीस्याम धाम धर। प्रिया प्रेम के अंक अलंकृत, चित्रित चतुर सिरोमनि निजु कर॥ दंपति अति अनुराग मुदित कल, गान करत मन हरत परस्पर। (जै श्री) हित हरिवंश प्रसंसि परायन, गायन अलि सुर देत मधुर तर॥५॥