हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
DevanagariHindipublished275 पृष्ठ
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७० • • हित चौरासी भावार्थ-मंगल प्रभात की वेला में हर्षोन्मादित युगल किशोर अलसाये हुए लटक लटक कर लता भवन की मंजुल भूमि पर मादक गति से चलते हैं। वृन्दावन निकुञ्ज धाम में सूरत-विलासी श्रीश्यामसुन्दर की मालाएँ श्रीराधा के उरोज चर्चित केशर लेप से मण्डित हैं। इसी प्रकार श्रीप्रियाजी के श्रीअंगों में प्रेम चिह्न (नख क्षत) अलङ्कृत हैं, जिन्हें चतुर शिरोमणि लाल ने अपने हाथों से चित्रित किया है। श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि अत्यधिक प्रेम उल्लसित दम्पति मधुर मधुर गान करते हुए एक दूसरे का मन हरण कर रहे हैं, और उस गान के साथ प्रशंसा परायण सखियाँ अपना मधुर तर स्वर मिला रही हैं।
- ६ - अवतरण- सम्पूर्ण रात्रि युगल किशोर ने लता मन्दिर में एकान्तिक रस विलास किया है। प्रभात हुआ जानकर श्रीलाल जी अकेले ही निकुञ्ज भवन से चल निकले किन्तु सामने से आते हुए श्रीहित अलिजी ने उन्हें देख लिया। श्याम सुन्दर के श्रीवपु में रति विहार के अनेकों चिह्न चिह्नित थे। उन्हें देख कर हित सखि मुसका गईं। श्याम सुन्दर ने लजाकर उन चिन्हों को छिपाना चाहा किन्तु दोनों प्रेमियों के एकान्त मिलन का भेद खुल ही चुका था। अतः उसका सुखवर्द्धन करती हुए श्रीहित सजनि ने कहा- राग विभास मूल-कौन चतुर जुवती प्रिया, जाहि मिलत लाल चोर ह्रै रैन। दुरवत क्यौंऽब दूरै सुनि प्यारे, रंग में गहले चैन में नैन।। उर नख चंद विराने पट, अटपटे से बैन। (जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधापति प्रमथित मैन।।६।। भावार्थ-(श्रीहित अलि ने कहा-) “हे लाल ! ऐसी कौन चतुर युवती प्रेयसी है (जिससे) आप रात्रि में चोरी चोरी मिलते हैं ? हे प्यारे ! आनन्द विलास रंजित एवं सुख पूरित आपके नयन भला कहीं छिपाने से छिप सकते हैं ? वक्षस्थल पर ये नख चन्द्र के चिह्न पलटे हुए पराये वस्त्र और तिस पर