हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ • • हित चौरासी उक्त पद संख्या छः में इसी प्रकार की रति विपरीत क्रीड़ा का कुशल सङ्केत प्रतीत होता है। – ७ – अवतरण– शरद की रात्रि में शीतल एवं मन्द समीर सौरभ वासित व्यजन झल रहा है। सुधाकर अपनी सुधा रश्मियों से वृन्दावन का सिञ्चन कर रहा है। अतीव सुखमय अवसर है। किसी सघन नव पल्लव मण्डित लता मण्डप में रसिक शेखर युगल किशोर अनिर्वचनीय रस क्रीडा में तल्लीन हैं और बाहर कुअ रन्ध्रों से लगी रस लोलुप सहचरियाँ युगल किशोर की रसमयी क्रीड़ा के दर्शन से परम सुख का अनुभव कर रही हैं। इस निभृत निकुअ विहार रस का वर्णन श्रीहित हरिवंश महाप्रभु इस प्रकार करते हैं– बिलावल मूल–आजु निकुंज मंजु में खेलत, नवल किसोर नवीन किसोरी। अति अनुपम अनुराग परस्पर, सुनि अभूत भूतल पर जोरी।। विद्रुम फटिक विविध निर्मित धर, नव कर्पूर पराग न थोरी। कौंमल किसलय सैन सुपेसल, तापर स्याम निवेसित गोरी।। मिथुन हास परिहास परायन, पीक कपोल कमल पर झोरी। गौर स्याम भुज कलह मनोहर, नीवी बंधन मोचत डोरी।। हरि उर मुकुर बिलोकि अपनपौ, विभ्रम विकल मान जुत भोरी। चिबुक सुचारु प्रलोइ प्रबोधत, पिय प्रतिबिंब जनाइ निहोरी।।