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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

हित चौरासी • • ७३ 'नेति नेति' बचनामृत सुनि सुनि, ललितादिक देखतिं दुरि चोरी। (जै श्री) हित हरिवंश करत कर धूनन, प्रनय कोप मालावलि तोरी॥७॥ भावार्थ – सुन्दर निकुंज मंदिर में नवल किशोर स्याम एवं नवल किशोरी श्रीराधा रस क्रीड़ा संलग्न हैं। दोनों का पारस्परिक अनुराग भी अति अनुपम है। यह अनोखी जोड़ी भूतल (स्थित श्रीवृन्दावन) में ही सुनी एवं देखी जाती है निकुंज मंदिर की भूमि दिव्य मूँगा स्फटिक आदि नाना मणियों से खचित है। उस मणिमय भूमि पर नव कर्पूर की रज बिखर रही है। सुकोमल नव पल्लव रचित एक शय्या सुशोभित है। उस शय्या पर श्याम सुन्दर ने श्रीप्रियाजी को आग्रह पूर्वक विराजमान किया है। भाव यह है कि उन्हें निकुञ्जान्तर्गत शय्या में पौढ़ाया है। हास परिहास परायण युगल किशोर ने परस्पर कपोल–कमल पर ताम्बुल की पीक अंकित करके रस विस्तार किया है। उस समय गौर–श्याम का बाहु कलह बड़ा मनोहर प्रतीत होता है। पश्चात् श्यामसुन्दर श्री प्रियाजी के कटि बन्धन मुक्त करने का सरस प्रयास करते हैं। श्रीराधा प्रियतम के उज्ज्वल वक्ष में अपनी छवि देखकर विभ्रम से व्याकुल तथा मान–युक्त हो जाती हैं। तब प्रियतम उनके अत्यन्त सुन्दर चिबुक को सहलाकर अनुनयपूर्ण निवेदन करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि यह आपकी सुन्दर छवि का ही प्रतिबिम्ब है। श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि इस प्रेम कलह में श्रीप्रिया के मुख से 'नेति–नेति' वचनामृत सुनकर ललितादि सहचरी छिपकर चोरी चोरी इस प्रेम कलह का दर्शन कर रही हैं। श्रीप्रियाजी ने हाथापाई करते हुए प्रणय कोप वश श्रीलालजी के वक्ष स्थल की मालाएँ तोड़ दीं। टिप्पणी–(१) मान जुत भोरी– वृन्दावनेश्वरी श्रीराधा अद्भुत रूप लावण्य की वह पराकाष्ठा हैं। अपने नित्य नवीन रूप सौन्दर्य पर स्वयं मुग्ध होकर द्वैतात्मक भ्रम से व्याप्त हो जाती हैं। अतः प्रियतम के हृदय मुकुर में अपना प्रतिबिम्ब देखकर मानवती हो गयीं कि जाने किस सुन्दरी ने इन के हृदय पर अधिकार कर लिया और इन्होंने उसे स्थान दे रखा है।