हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ • • हित चौरासी इसलिये वे विभ्रम से व्याकुल हो गयीं। इस भ्रम और मान का निवारण श्रीलालजी ने बड़ी चतुरता से किया। उन्होंने अपने दीन अनुनय से श्रीप्रियाजी को जँचा दिया कि मेरे हृदय की मणि चौकी में आपका ही प्रतिबिम्ब है; किसी अन्य सुन्दरी का नहीं। – ८ – अवतरण – आज की रात्रि किसी अनिर्वचनीय विलास रस के आस्वादन में बीती है। युगल किशोर रात भर के अनींदे हैं, प्रभात हुआ जान कर सखि जन उन्हें शय्या कुञ्ज से मङ्गल कुञ्ज में ले जा रही हैं। सालस प्रिया के पग डगमगाते जा रहे हैं। प्रभात की इस छबि को देखकर श्रीहित अलि ने श्रीप्रियाजी से कहा– बिलावल मूल– अति ही अरुन तेरे नयन नलिन री। आलस जुत इतरात रँगमगे, भये निसि जागर मषिन मलिन री।। सिथिल पलक में उठति गोलक गति, बिंधयौ मोंहन मृग सकत चलि न री। (जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि, संभ्रम देत भ्रमरनि अलिन री।।८।। भावार्थ – अरी सखि ! आज तुम्हारे नयन कमल बड़े अरुणिम हैं। रात्रि के भर विलास एवं जागरण के चाव से अत्यन्त आलस्य युक्त हो रहे हैं। मिलन के गौरव से गर्वित, प्रेम रंग से छलक रहे हैं एवं कज्जल रंजित श्यामलता से शोभित है। सम्मोहन कारी नयनों की थकित पलकों में युग गोलक की मंथर गति ने मोहन मृग (श्रीश्याम सुन्दर) को वेध सा दिया है वे रस मुग्ध अवस्था में गति हीन से हो गये हैं।) श्रीहित हरिवंश कहते हैं–हे मरालवत् सुन्दर गति शीले ! तुम तो एक ओर भ्रमरों को अपने नेत्रों की सुन्दरता से कमल का संभ्रम उत्पन्न कर रही हो