हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ७७ करत केलि कंठ मेलि बाहु दंड गंड-गंड, परस, सरस रास लास मंडली जुरी।। स्याम-सुंदरी विहार, बाँसुरी मृदंग तार, मधुर घोष नूपुरादि किंकनी चुरी। (जै श्री) देखत हरिवंश आलि, निर्त्तनी सुधंग चलि, वारि फेरि देत प्राँन देह सौं दुरी।।१०।। भावार्थ- आज रस विदग्धा श्रीराधा एवं ललित नायक श्याम सुन्दर अनुपम छटा से शोभित हैं। अंग प्रत्यंग से प्रस्फुट रूप माधुर्य्य अवर्णनीय है। सहचरि परिकर में अनुराग विवश युगल, परस्पर स्कन्ध वाहु परिवेष्टित, कपोल का स्पर्श किये हुए सरस रास लास्य का विस्तार करते हैं। सुन्दर श्यामा-श्याम के रास विहार में वंशी मृदंग और तार वाद्यों का मधुर घोष क्षरित है एवं श्रीअंग पर धारण नूपुर किंकिणी वलयादि आभूषणों का मधुर सिञ्अन स्वर सम्मिलित है। नृत्यगति शीला श्रीराधा की तीव्र नृत्य गति को देखकर स्वामिनी की अंग भूता रस विमुग्धा हित अलि अपने प्राणों को बारम्बार न्यौछावर करती हैं।
- ११ - अवतरण-शरद की सुन्दर रजनी है। आकाश में निर्मल एवं पूर्ण चन्द्र सुशोभित है। मञ्जुल श्रीवृन्दावन में चन्द्र देव की शुभ्र किरणों का वितान तना हैं। शीतल पवन सौरभ भार लेकर मन्थर मन्थर गति से बह रहा है। यमुना के निकट तट पर एक रम्य कुञ्ज कुटी है लतावेष्टित, प्रसून पल्लव मण्डित। रस लम्पट श्रीमोहनलाल अनुनय एवं चाटुकारी पूर्ण वचनों से प्रियतमा श्रीराधा को प्रसन्न करना चाह रहे हैं। इस पद में दिव्य सौरत पूर्व रस का वर्णन किया गया है। विलावल मूल-मंजुल कल कुंज देस, राधा हरि विसद वेस, राका नभ कुमुद-बंधु, सरद जामिनी।