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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

७८ • • हित चौरासी साँवल दुति कनक अंग, विहरत मिलि एक संग; नीरद मनि नील मध्य, लसत दामिनी।। अरुन पीत नव दुकूल, अनुपम अनुराग मूल; सौरभ जुत सीत अनिल, मंद गामिनी। किसलय दल रचित सैन, बोलत पिय चाटु बैन; मान सहित प्रति पद, प्रतिकूल कामिनी।। मोहन मन मथत मार, परसत कुच नीवी हार; वेपथ जुत ‘नेति–नेति,’ बदति भामिनी। "नरवाहन" प्रभु सुकेलि, वहु विधि भर, भरत झेलि, सौरत रस रूप नदी जगत पावनी।।११।। भावार्थ—शरद् की मधुमयी राका निकुंज प्राङ्गण को पूर्ण चन्द्र की रजत् रश्मियों से आलोकित कर रही हैं। सुन्दरातिसुन्दर निकुञ्जान्तर कक्ष में सौन्दर्य धाम श्रीराधा एवं श्रीहरि सुन्दर श्रृंगार से सुसज्जित हैं। विहरणशील युगल की श्याम और गौर अङ्ग कान्ति मिलकर ऐसे प्रतिबिम्बित हैं जैसे नील मणिवत् जलधर में चपला का चाञ्चल्य। श्याम सुन्दर के सुभग अङ्ग पर पीत दुकूल सज रहा है और श्रीराधा के गोराङ्ग पर लाल (सुरङ्ग) चूनरी फब रही मानो यह अरुण पीत वस्त्र अनुराग प्रेम के मूलाधार हैं। इधर सुवासित शीतल समीर मन्द मन्द व्यजन झल रहा है। निकुञ्ज भवन में किशलय दल निर्मित शय्या पर (विराजित) प्रियतम अनेक अनुनय विनय एवं प्रणय वाक्यों के द्वारा प्रेयसी श्रीराधा को सुरत केलि के हेतु सहमत करने का प्रयास करते हैं। किन्तु कामिनी कणकण में रस तृषा वर्द्धन करती हुई प्रति पद क्षण क्षण में वामता ग्रहण करती जा रही है। प्रेमावेशित मोहन का मन स्मर रुज से व्यथित हो गया है। अतः बारम्बार उरोज कटि बन्धन एवं हार आदि का स्पर्श कर देते हैं तब लज्जा क्रान्त कंपित कामिनी "नहीं" "नहीं" का मधुर शब्द रूप मौक्तिक क्षरित करती है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि श्रीयुगल की इस कल्लोल माला को नरवाहन हृदय में विविध प्रकार से अनवरत धारण करते हैं क्योंकि यह सुख केलि सरिता जगमंगल मयी है।