भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 9

परम सुखद सुशील सुन्दर पाहि स्वामिन् मम धनी। जय जय श्री हरिवंश प्रसंसित सब दुनी॥३। जय जय श्री हरिवंश नाम गुन गाइ है। प्रेम लक्षना भक्ति सुदृढ़ करि पाइ है॥ अरु बाढ़ै रसरीति प्रीति चित ना टरै। जीति विषम संसार कीरति जग बिस्तरै॥ बिस्तरै सब जग विमल कीरति साधु संगति ना टरै। वास वृन्दाविपिन पावै श्रीराधिका जु कृपा करै॥ चतुर युगल किसोर सेवक दिन प्रसादहिं पाइ है। जय जय श्री हरिवंश नाम गुन गाइ है॥४। श्रीहित पद पद्मैकनिष्ठ श्रीहरिराम व्यास राधावल्लभ व्यास के इष्ट मित्र गुरुदेव। श्री हरिवंश प्रगट कियौ, कुंज महल रस भेव॥ व्यास आस हरिवंश की, तिनहीं को बड़ भाग। वृन्दावन की कुंज में, सदा रहत अनुराग॥ हित हरिवंश कृपा बिना, निमिष नहीं कहुँ ठौर। व्यासदास की स्वामिनी, प्रगटी सब सिरमौर॥ गो. श्री कृष्णचन्द्रजी: स्फुरद् वदन पंकजः कनककूट देहद्युतिः। प्रशस्त सुख सम्पदां निधिरपूर्व मानप्रदः॥ सकृष्ण वृषभानुजा चरणमाधुरी चंचुरः। सदा मधुर वाक्पटुर्जयति साधुवैयासकिः॥ प्रेमानन्दो पुलकित गात्रौ विद्युद्धाराधर समकान्तिः। राधा कृष्णौ मनसि दधानं वन्देऽहं श्रीहित हरिवंशम्॥ श्रीहित वृन्दावनैकनिष्ठ श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती : त्वमसिहि हरिवंश श्यामचन्द्रस्य वंशः। परम रमद नादै मोहिताशेष विश्वः॥