भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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८० हितोपदेशः [ मित्रलाभः २०९- स्वाभाविकं तु यन्मित्रं भाग्येनैवाभिजायते । तदकृत्रिमसौहार्दमापत्स्वपि न मुञ्चति ॥ २०९ ॥ स्वभावसे स्नेह करने वाला ( अकृत्रिम ) मित्र तो प्रारब्धसेही मिलता है कि जो सच्ची मित्रताको आपत्तियोंमेंभी नहीं छोड़ता है ॥ २०९ ॥ न मातरि न दारेषु न सोदर्ये न चात्मजे । विश्वासस्तादृशः पुंसां यादृङ्मित्रे स्वभावजे' ॥ २१० ॥ न मातामें, न स्त्रीमें, न सगे भाईमें, और न पुत्रमें ऐसा विश्वास होता है कि जैसा स्वाभाविक मित्रमें होता है ॥ २१० ॥ इति मुहुर्विचिन्त्य 'अहो दुर्देवम् ! इसप्रकार वारंवार सोच कर ( बोला )-'अहो दुर्भाग्य है ! यतः,— स्वकर्मसंतानविचेष्टितानि कालान्तरावर्तिशुभाशुभानि । इहैव दृष्टानि मयैव तानि जन्मान्तराणीव दशान्तराणि ॥ २११ ॥ क्योंकि—इस संसारमें अपने पापपुण्योंसे किये गये और समयके उलट- पलटसे बदलने वाले सुखदुःख, पूर्वजन्मके किये हुये पापपुण्यके फल मैंने यहांही देख लिये ॥ २११ ॥ अथवेत्थमेवैतत्,— कायः संनिहिता पायः संपदः पदमापदाम् । समागमाः सापगमाः सर्वमुत्पादि भङ्गुरम् ॥ २१२ ॥ अथवा यह ऐसेही है-शरीरके पासही उसका नाश है और संपत्तियां आप- त्तियोंका मुख्य स्थान हैं और संयोगके साथ वियोग है, अर्थात् अस्थिर है और उत्पन्न हुआ सब नाश होने वाला है ॥ २१२ ॥ पुनर्विमृश्याह— ‘शोकारातिभयत्राणं प्रीतिविश्रम्भभाजनम् । केन रत्नमिदं सृष्टं ‘मित्र’मित्यक्षरद्वयम् ॥ २१३ ॥ और विचार कर बोला-‘शोक और शत्रुके भयसे बचाने वाला, तथा प्रीति और विश्वासका पात्र, यह दो अक्षरका ‘मित्र’ रूपी रत्न किसने रचा है ? ॥२१३॥