भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 99

-२०८] चातुर्यसे लावण्यवतीकी प्राप्ति ७९ एक दिन कुट्टनीके उपदेशसे उस राजपुत्रने नहा धो कर और देहमें चन्दन आदि सुगन्ध द्रव्य लगा कर और सुवर्णके रत्नजटित आभूषणोंको पहन कर कहा-'चारुदत्त ! आजसे लेकर एक मास तक मुझे पार्वतीजीका व्रत करना है । इसलिये आजसे यहां नित्य रातको एक कुलीन जवान स्त्री मुझे ला दिया कर, मैं उसकी यथोचित रीतिसे पूजा करूंगा' ॥ फिर वह चारुदत्त वैसीही नव- जवान स्त्री ला कर दिया करता था। और स्वयं छुप कर देखता रहता था, कि यह क्या करता है. और वह तुंगबल उस जवान स्त्रीको बिनाही छुए दूरसे वस्त्र, आभूषण, गन्ध चन्दनादिसे पूजा करके और रखवाला साथ दे कर विदा कर दिया करता था। फिर उस बनियेके पुत्रने यह देख विश्वाससे और चित्तमें लोभके मारे अपनी स्त्री लावण्यवतीको ला कर दे दिया । और उस तुंगबलने उसे प्राणप्यारी लावण्यवती जान कर शीघ्रतासे उठ गाढ़ा आलिंगन कर आनन्दसे नेत्रोंको कुछ बन्द-सा कर पलंग पर उसके साथ विलास किया । यह देख कर बनियेका बेटा चित्र लिखेके समान हो कर इस कार्यमें मूर्ख बन अधिक दुःखी हुआ । इसलिये मै कहता हूं कि, "आप देख कर" इत्यादि । और तुम भी वैसेही दुःखी बनोगे ।' उसके हितकारक बचनको न मान कर बड़े भयसे मूर्खकी भांति वह मन्थर उस सरोवरको छोड़ कर चला । वे हिरण्यक आदिभी स्नेहसे विपत्तिकी शंका करते हुए मन्थरके पीछे पीछे चले । फिर पटपड़में जाते हुए मन्थरको, बनमें घूमते हुए किसी व्याधने पाया । वह उसे पा कर और उठा कर धनुषमें बांध घूमता हुआ क्लेशसे उत्पन्न हुई क्षुधा और प्याससे व्याकुल, अपने घरकी ओर चला । पीछे मृग, काग और चूहा, ये बड़ा विषाद करते हुए उसके पीछे पीछे चले. ततो हिरण्यको विलपति— एकस्य दुःखस्य न यावदन्तं गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य । तावद्वितीयं समुपस्थितं मे छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥ २०८ ॥ फिर हिरण्यक विलाप करने लगा—'समुद्रके पारके समान निःसीम एक दुःखके पार जब तक मैं नहीं जाता हूं तब तक मेरे लिये दूसरा दुःख आ कर उपस्थित हो जाता है, क्योंकि अनर्थ (आपत्ति) के साथ बहुत-से अनर्थ आ पड़ते हैं ॥ २०८ ॥