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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

-२०८] चातुर्यसे लावण्यवतीकी प्राप्ति ७९ एक दिन कुट्टनीके उपदेशसे उस राजपुत्रने नहा धो कर और देहमें चन्दन आदि सुगन्ध द्रव्य लगा कर और सुवर्णके रत्नजटित आभूषणोंको पहन कर कहा-'चारुदत्त ! आजसे लेकर एक मास तक मुझे पार्वतीजीका व्रत करना है । इसलिये आजसे यहां नित्य रातको एक कुलीन जवान स्त्री मुझे ला दिया कर, मैं उसकी यथोचित रीतिसे पूजा करूंगा' ॥ फिर वह चारुदत्त वैसीही नव- जवान स्त्री ला कर दिया करता था। और स्वयं छुप कर देखता रहता था, कि यह क्या करता है. और वह तुंगबल उस जवान स्त्रीको बिनाही छुए दूरसे वस्त्र, आभूषण, गन्ध चन्दनादिसे पूजा करके और रखवाला साथ दे कर विदा कर दिया करता था। फिर उस बनियेके पुत्रने यह देख विश्वाससे और चित्तमें लोभके मारे अपनी स्त्री लावण्यवतीको ला कर दे दिया । और उस तुंगबलने उसे प्राणप्यारी लावण्यवती जान कर शीघ्रतासे उठ गाढ़ा आलिंगन कर आनन्दसे नेत्रोंको कुछ बन्द-सा कर पलंग पर उसके साथ विलास किया । यह देख कर बनियेका बेटा चित्र लिखेके समान हो कर इस कार्यमें मूर्ख बन अधिक दुःखी हुआ । इसलिये मै कहता हूं कि, "आप देख कर" इत्यादि । और तुम भी वैसेही दुःखी बनोगे ।' उसके हितकारक बचनको न मान कर बड़े भयसे मूर्खकी भांति वह मन्थर उस सरोवरको छोड़ कर चला । वे हिरण्यक आदिभी स्नेहसे विपत्तिकी शंका करते हुए मन्थरके पीछे पीछे चले । फिर पटपड़में जाते हुए मन्थरको, बनमें घूमते हुए किसी व्याधने पाया । वह उसे पा कर और उठा कर धनुषमें बांध घूमता हुआ क्लेशसे उत्पन्न हुई क्षुधा और प्याससे व्याकुल, अपने घरकी ओर चला । पीछे मृग, काग और चूहा, ये बड़ा विषाद करते हुए उसके पीछे पीछे चले. ततो हिरण्यको विलपति— एकस्य दुःखस्य न यावदन्तं गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य । तावद्वितीयं समुपस्थितं मे छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥ २०८ ॥ फिर हिरण्यक विलाप करने लगा—'समुद्रके पारके समान निःसीम एक दुःखके पार जब तक मैं नहीं जाता हूं तब तक मेरे लिये दूसरा दुःख आ कर उपस्थित हो जाता है, क्योंकि अनर्थ (आपत्ति) के साथ बहुत-से अनर्थ आ पड़ते हैं ॥ २०८ ॥

स्वाभाविकं तु यन्मित्रं भाग्येनैवाभिजायते ।

८० हितोपदेशः [ मित्रलाभः २०९- स्वाभाविकं तु यन्मित्रं भाग्येनैवाभिजायते । तदकृत्रिमसौहार्दमापत्स्वपि न मुञ्चति ॥ २०९ ॥ स्वभावसे स्नेह करने वाला ( अकृत्रिम ) मित्र तो प्रारब्धसेही मिलता है कि जो सच्ची मित्रताको आपत्तियोंमेंभी नहीं छोड़ता है ॥ २०९ ॥ न मातरि न दारेषु न सोदर्ये न चात्मजे । विश्वासस्तादृशः पुंसां यादृङ्मित्रे स्वभावजे' ॥ २१० ॥ न मातामें, न स्त्रीमें, न सगे भाईमें, और न पुत्रमें ऐसा विश्वास होता है कि जैसा स्वाभाविक मित्रमें होता है ॥ २१० ॥ इति मुहुर्विचिन्त्य 'अहो दुर्देवम् ! इसप्रकार वारंवार सोच कर ( बोला )-'अहो दुर्भाग्य है ! यतः,— स्वकर्मसंतानविचेष्टितानि कालान्तरावर्तिशुभाशुभानि । इहैव दृष्टानि मयैव तानि जन्मान्तराणीव दशान्तराणि ॥ २११ ॥ क्योंकि—इस संसारमें अपने पापपुण्योंसे किये गये और समयके उलट- पलटसे बदलने वाले सुखदुःख, पूर्वजन्मके किये हुये पापपुण्यके फल मैंने यहांही देख लिये ॥ २११ ॥ अथवेत्थमेवैतत्,— कायः संनिहिता पायः संपदः पदमापदाम् । समागमाः सापगमाः सर्वमुत्पादि भङ्गुरम् ॥ २१२ ॥ अथवा यह ऐसेही है-शरीरके पासही उसका नाश है और संपत्तियां आप- त्तियोंका मुख्य स्थान हैं और संयोगके साथ वियोग है, अर्थात् अस्थिर है और उत्पन्न हुआ सब नाश होने वाला है ॥ २१२ ॥ पुनर्विमृश्याह— ‘शोकारातिभयत्राणं प्रीतिविश्रम्भभाजनम् । केन रत्नमिदं सृष्टं ‘मित्र’मित्यक्षरद्वयम् ॥ २१३ ॥ और विचार कर बोला-‘शोक और शत्रुके भयसे बचाने वाला, तथा प्रीति और विश्वासका पात्र, यह दो अक्षरका ‘मित्र’ रूपी रत्न किसने रचा है ? ॥२१३॥

-२१४ ] कछुएको छुडानेका यत्न ८१- किं च,— मित्रं प्रीतिरसायनं नयनयोरानन्दनं चेतसः पात्रं यत्सुखदुःखयोः सह भवेन्मित्रेण तद्दुर्लभम् । ये चान्ये सुहृदः समृद्धिसमये द्रव्याभिलाषाकुला- स्ते सर्वत्र मिलन्ति तत्त्वनिकषग्रावा तु तेषां विपत्' ॥२१४॥ और अंजनके समान नेत्रोंको प्रसन्न करने वाला, चित्तको आनन्द देने वाला और मित्रके साथ सुखदुःखमें साथ देने वाला, अर्थात् दुःखमें दुःखी, सुखमें सुखी हो ऐसा मित्र होना दुर्लभ है, और संपत्ति (चलती) के समयमें धन हरने वाले मित्र हर जगह मिलते हैं, परन्तु विपत्कालही उनके परखनेकी कसौटी है' ॥२१४ इति बहु विलप्य हिरण्यकश्चित्राङ्गलघुपतनकावाह- 'यावदयं व्याधो वनान्न निःसरति तावन्मन्थरं मोचयितुं यत्नः क्रियताम् ।' तावूचतुः-'सत्वरं कार्यमुच्यताम् ।' हिरण्यको ब्रूते-'चित्राङ्गो जलसमीपं गत्वा मृतमिवात्मानं दर्शयतु । काकश्च तस्योपरि स्थित्वा चञ्च्वा किमपि विलिखतु । नूनमनेन लुब्धकेन तत्र कच्छपं परित्यज्य मृगमांसार्थिना सत्वरं गन्तव्यम् । ततोऽहं मन्थरस्य बन्धनं छेत्स्यामि । संनिहिते लुब्धके भवद्भ्यां पलायितव्यम् ।' चित्राङ्गलघुपतनकाभ्यां शीघ्रं गत्वा तथानुष्ठिते सति स व्याधः श्रान्तः पानीयं पीत्वा तरोरधस्तादुपविष्टस्तथा- विधं मृगमपश्यत् । ततः कर्तरिकामादाय प्रहृष्टमना मृगान्तिकं चलितः । तत्रान्तरे हिरण्यकेनागत्य मन्थरस्य बन्धनं छिन्नम् । स कूर्मः सत्वरं जलाशयं प्रविवेश । स मृग आसन्नं तं व्याधं विलोक्योत्थाय पलायितः । प्रत्यावृत्य लुब्धको यावत्तरुतलमा- याति तावत्कूर्ममपश्यन्नचिन्तयत्—'उचितमेवैतन्ममासमीक्ष्य- कारिणः । इस प्रकार बहुत-सा विलाप करके हिरण्यकने चित्रांग और लघुपतनकसे कहा-'जब तक यह व्याध वनसे न निकल जाय तब तक मन्थरको छुड़ानेका यत्न करो।' वे दोनों बोले-'शीघ्र कार्यको कहिये।' हिरण्यक बोला-'चित्रांग जलके हि० ६

तुम्हारे पास आवे तब भाग जाना ।' जब चित्रांग और लघुपतनकने शीघ्र जा

८२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः २१५- पास जा कर मरेके समान अपना शरीर दिखावें और काक उस पर बैठके चोंचसे कुछ कुछ खोदें, यह व्याध कछुए को अवश्य वहां छोड़ कर मृगमांसके लोभसे शीघ्र जायगा । फिर मैं मन्थरके बंधन काट डालूंगा । और जब व्याध तुम्हारे पास आवे तब भाग जाना ।' जब चित्रांग और लघुपतनकने शीघ्र जा कर वैसाही किया तो वह व्याध पानी पी कर एक पेड़के नीचे बैठा मृगको उस प्रकार देख पाया । फिर छुरी लेकर आनंदित होता हुआ मृगके पास जाने लगा इतनेहीमें हिरण्यकने आ कर कछुएका बंधन काट डाला । तब वह कछुआ शीघ्र सरोवरमें घुस गया । वह मृग उस व्याधको पास आता हुआ देख उठ कर भाग गया । जब व्याध लौट कर पेड़के नीचे आया, तब कछुएको न देख कर सोचने लगा—'मेरे समान बिना विचार करने वालेके लिये यही उचित था । यतः,— यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते । ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि' ॥ २१५ ॥ क्योंकि—जो निश्चितको छोड़ अनिश्चित पदार्थका आसरा करता है उसके निश्चित पदार्थ नष्ट हो जाते हैं, और अनिश्चितभी जाता रहता है' ॥ २१५ ॥ ततोऽसौ स्वकर्मवशान्निराशः कटकं प्रविष्टः । मन्थरादयः सर्वे त्यक्तापदः स्वस्थानं गत्वा तथा सुखमास्थिताः ॥ फिर वह अपने प्रारब्धको दोष लगाता हुआ निराश होकर अपने घर गया । मंथर आदिभी सब आपत्तिसे निकल अपने अपने स्थान पर जा कर सुखसे रहने लगे । अथ राजपुत्रैः सानन्दमुक्तम्—‘सर्वं श्रुतवन्तः सुखिनो वयम्। सिद्धं नः समीहितम् ।' विष्णुशर्मोवाच—‘एतावता भवतामभि- लषितं संपन्नम् । पीछे राजपुत्र प्रसन्न होकर कहने लगे-‘हमने सब सुना और सुखी हुए हमारा कार्य सिद्ध हुआ ।' विष्णुशर्मा बोले-‘इतना आपका मनोरथ पूरा हुआ है ॥

इति हितोपदेशे मित्रलाभो नाम प्रथमः कथासंग्रहः समाप्तः ।

-२१६ ] मित्रलाभकी प्रशस्ति ८३- अपरमपीदमस्तु— मित्रं प्राप्नुत सज्जना जनपदैर्लक्ष्मीः समालम्ब्यतां भूपालाः परिपालयन्तु वसुधां शश्वत्स्वधर्मे स्थिताः । आस्तां मानसतुष्टये सुकृतिनां नीतिर्नवोढेव वः कल्याणं कुरुतां जनस्य भगवांश्चन्द्रार्धचूडामणिः'॥२१६॥ इति हितोपदेशे मित्रलाभो नाम प्रथमः कथासंग्रहः समाप्तः । यह औरभी होय—सज्जन लोग मित्रको पावें, नगरनिवासी लक्ष्मीको पावें, राजा लोग सदा अपने धर्ममें रह कर पृथ्वीका रक्षण करें, आपकी नीति नव- यौवना स्त्रीके समान पण्डितोंके चित्तको प्रसन्न करें और भगवान् महादेवजी आपका कल्याण करें ॥ २१६ ॥ पं० रामेश्वरभट्टका किया हुआ हितोपदेश ग्रंथके मित्रलाभ नामक पहले अध्यायका भाषा अनुवाद समाप्त हुआ. शुभम्.

हितोपदेशः ❦ सुहृद्भेदः २ अथ राजपुत्रा ऊचुः—'आर्य ! मित्रलाभः श्रुतस्तावदस्माभिः । इदानीं सुहृद्भेदं श्रोतुमिच्छामः ।' विष्णुशर्मोवाच—'सुहृद्भेदं तावच्छृणुत; फिर राजपुत्र बोले-‘गुरुजी ! मित्रलाभ तो हम सुन चुके, अब सुहृद्भेद सुनना चाहते हैं ।' विष्णुशर्मा बोले–‘अब सुहृद्भेद सुनिये; यस्यायमाद्यः श्लोकः— वर्धमानो महास्नेहो मृगेन्द्रवृषयोर्वने । पिशुनेनातिलुब्धेन जम्बुकेन विनाशितः' ॥ १ ॥ उसका पहला वाक्य यह है—‘वनमें सिंह और बैलका बड़ा स्नेह बढ़ गया था, उसे धूर्त और अति लोभी गीदड़ने छुड़वा दिया' ॥ १ ॥ राजपुत्रैरुक्तम्—'कथमेतत् ?' । विष्णुशर्मा कथयति— राजपुत्र बोले–‘यह कथा कैसे है ?' विष्णुशर्मा कहने लगे. कथा १ [ एक बनिया, बैल, सिंह और गीदड़ोंकी कहानी ] 'अस्ति दक्षिणापथे सुवर्णवती नाम नगरी । तत्र वर्धमानो नाम वणिक् निवसति । तस्य प्रचुरेऽपि वित्तेऽपरान्बन्धूनतिसमृद्धा- न्समीक्ष्य पुनरर्थवृद्धिः करणीयेति मतिर्बभूव । 'दक्षिण दिशामें सुवर्णवती नाम नगरी है; उसमें वर्धमान नाम एक बनिया रहता था । उसके पास बहुत-सा धनभी था, परन्तु अपने दूसरे भाईबन्धुओंको अधिक धनवान् देख कर उसकी यह लालसा हुई की और अधिक धन इकट्ठा करना चाहिये.

-६ ] द्रव्यविषयक परामर्श ८५ यतः,— अधोऽधः पश्यतः कस्य महिमा नोपचीयते ? । उपर्युपरि पश्यन्तः सर्व एव दरिद्रति ॥ २ ॥ क्योंकि—अपनेसे नीचे नीचे (हीन) अर्थात् दरिद्रियोंको देख कर किसकी महिमा नहीं बढ़ती है ? अर्थात् सबको अभिमान बढ़ जाता है, और अपनेसे ऊपर ऊपर अर्थात् अधिक धनवानोंको देख कर सब लोग अपनेको दरिद्री समझते हैं ॥ २ ॥ अपरं च,— ब्रह्महापि नरः पूज्यो यस्यास्ति विपुलं धनम् । शशिनस्तुल्यवंशोऽपि निर्धनः परिभूयते ॥ ३ ॥ और दूसरे-जिसके पास बहुत-सा धन है उस ब्रह्मघातक मनुष्यकाभी सत्कार होता है और चन्द्रमाके समान अतिनिर्मल वंशमें उत्पन्न हुएभी निर्धन मनुष्यका अपमान किया जाता है ॥ ३ ॥ अन्यच्च,— अव्यवसायिनमलसं दैवपरं साहसाच्च परिहीनम् । प्रमदेव हि वृद्धपतिं नेच्छत्युपगूहितुं लक्ष्मीः ॥ ४ ॥ और जैसे नवजवान स्त्री बूढ़े पतिको नहीं चाहती है वैसेही लक्ष्मीभी निरुद्योगी, आलसी, 'प्रारब्धमें जो लिखा है सो होगा' ऐसा भरोसा रख कर चुपचाप बैठने वाले, तथा पुरुषार्थ हीन मनुष्यको नहीं चाहती है ॥ ४ ॥ अपि च,— आलस्यं स्त्रीसेवा सरोगता जन्मभूमिवात्सल्यम् । संतोषो भीरुत्वं षड् व्याघाता महत्त्वस्य ॥ ५ ॥ औरभी आलस्य, स्त्रीकी सेवा, रोगी रहना, जन्मभूमिका स्नेह, संतोष और डरपोकपन ये छः बातें उन्नतिके लिये बाधक हैं ॥ ५ ॥ यतः,— संपदा सुस्थितंमन्यो भवति स्वल्पयापि यः । कृतकृत्यो विधिर्मन्ये न वर्धयति'तस्य ताम् ॥ ६ ॥ क्योंकि-जो मनुष्य थोड़ीही संपत्तिसे अपनेको सुखी मानता है, विधाता समाप्तकार्य मान कर उस मनुष्यकी उस संपत्तिको नहीं बढ़ाता है ॥ ६ ॥

८६ हितोपदेशः [सुहृद्भेदः ७- अपरं च,- निरुत्साहं निरानन्दं निर्वीर्यमरिनन्दनम् । मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत्पुत्रमीदृशम् ॥ ७ ॥ और निरुत्साही, आनन्दरहित, पराक्रमहीन तथा शत्रुको प्रसन्न करने वाले ऐसे पुत्रको कोई स्त्री न जने अर्थात् ऐसे पुत्रका जन्म न होनाही अच्छा है ॥७॥ तथा चोक्तम्,- अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेद्भवक्षयात् । रक्षितं वर्धयेत् सम्यग्वृद्धं तीर्थेषु निक्षिपेत् ॥ ८ ॥ जैसा कहा है—नहीं पाये धनके पानेकी इच्छा करना, पाये हुए धनकी चोरी आदि नाशसे रक्षा करना, रक्षा किये हुए धनको व्यापार आदिसे बढ़ाना और अच्छी तरह बढ़ाए धनको सत्पात्रमें दान करना चाहिये ॥ ८ ॥ यतो लब्धुमिच्छतोऽर्थयोगादर्थस्य प्राप्तिरेव । लब्धस्याप्यरक्षि- तस्य निधेरपि स्वयं विनाशः । अपि च, अवर्धमानश्चार्थः काले स्वल्पव्ययोऽप्यञ्जनवत्क्षयमेति । अनुपभुज्यमानश्च निष्प्रयोजन एव सः । क्योंकि लाभकी इच्छा करने वालेको धन मिलताही है, एवं प्राप्त हुए परंतु रक्षा नहीं किये गये खजानेकाभी अपने आप नाश हो जाता है, औरभी यह है कि-बढ़ाया नहीं गया धन कुछ कालमें थोड़ा थोड़ा व्यय हो कर काजलके समान नाश हो जाता है, और नहीं भोगा गया भी खजाना वृथा है । तथा चोक्तम्,- धनेन किं यो न ददाति नाश्नुते बलेन किं यश्च रिपून बाधते । श्रुतेन किं यो न च धर्ममाचरेत् किमात्मना यो न जितेन्द्रियो भवेत् ॥ ९ ॥ जैसा कहा है—उस धनसे क्या है ? जो न देता है और न खाता (उपभोग करता) है; उस बलसे क्या है ? जो वैरियाँको नहीं सताता है, उस शास्त्रसे क्या है ? जो धर्मका आचरण नहीं करता है; और उस आत्मासे क्या है ? जो जितेंद्रिय नहीं है ॥ ९ ॥

-१३ ] द्रव्यसंचय और पुरुषार्थकी प्रशंसा ८७ यतः,— जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः । स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥ १० ॥ क्योंकि—जैसे जलकी एक एक बूंदके गिरनेसे धीरे २ घड़ा भर जाता है वही कारण सब प्रकारकी विद्याओंका, धनका और धर्मकाभी है ॥ १० ॥ दानोपभोगरहिता दिवसा यस्य यान्ति वै । स कर्मकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति' ॥ ११ ॥ दान और भोगके बिना जिसके दिन जाते हैं वह लुहारकी धोंकनीके समान सांस लेता हुआभी मरेके समान है ॥ ११ ॥ इति संचिन्त्य नन्दकसंजीवकनामानौ वृषभौ धुरि नियोज्य शकटं नानाविधद्रव्यपूर्णं कृत्वा वाणिज्येन गतः कश्मीरं प्रति । यह सोच कर नन्दक और संजीवक नाम दो बैलोंको जुएमें जोत कर और छकड़ेको नाना प्रकारकी वस्तुओंसे लाद कर व्यापारके लिये काश्मीरकी ओर गया। अन्यच्च,— अञ्जनस्य क्षयं दृष्ट्वा वल्मीकस्य च संचयम् । अवन्ध्यं दिवसं कुर्याद्दानाध्ययनकर्मसु ॥ १२ ॥ और दूसरे—काजलके क्रम क्रमसे घटनेको और वल्मीक नाम चींटीके संच- यको देख कर, दान, पढ़ना और कामधंधामें दिनको सफल करना चाहिये ॥१२॥ यतः,— कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ? । को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ? ॥ १३ ॥ क्योंकि—बलवानोंको अधिक बोझ क्या है ? और उद्योग करने वालोंको क्या दूर है ? और विद्यावानोंको विदेश क्या है ? और मीठे बोलने वालोंका शत्रु कौन है ? ॥ १३ ॥ अथ गच्छतस्तस्य सुदुर्गनाम्नि महारण्ये संजीवको भग्नजानु- र्निपतितः । फिर उस जाते हुएका, सुदुर्ग नाम घने वनमें, संजीवक घुटना टूटनेसे गिर पडा ।

[Page Header] ८८ हितोपदेशः [सुहृद्भेदः १४-

तमालोक्य वर्धमानोऽचिन्तयत्— ‘करोतु नाम नीतिज्ञो व्यवसायमितस्ततः । फलं पुनस्तदेवाप्यं यद्विधेर्मनसि स्थितम् ॥ १४ ॥ उसे देख कर वर्धमान चिंता करने लगा—‘नीति जानने वाला इधर उधर भले ही व्यापार करे, परंतु उसको लाभ उतना ही होता है कि जितना विधाताके जीमें है ॥ १४ ॥ किंतु,— विस्मयः सर्वथा हेयः प्रत्यूहः सर्वकर्मणाम् । तस्माद्विस्मयमुत्सृज्य साध्ये सिद्धिर्विधीयताम्’ ॥ १५ ॥ परंतु—सब कार्योंको रोकने वाले संशयको छोड़ देना चाहिये, एवं संदेहको छोड़ कर, अपना कार्य सिद्ध करना चाहिये’ ॥ १५ ॥ इति संचिन्त्य संजीवकं तत्र परित्यज्य वर्धमानः पुनः स्वयं धर्मपुरं नाम नगरं गत्वा महाकायमन्यं वृषभमेकं समानीय धुरि नियोज्य चलितः। ततः संजीवकोऽपि कथंकथमपि खुरत्रये भारं कृत्वोत्थितः। यह विचार कर संजीवकको वहां छोड़ कर-फिर वर्धमान आप धर्मपुर नाम नगरमें जा कर एक दूसरे बड़े शरीर वाले बैलको ला कर जुएमें जोत कर चल दिया। फिर संजीवकभी बड़े कष्टसे तीन खुरोंके सहारे उठ कर खडा हुआ। यतः,— निमग्नस्य पयोराशौ पर्वतात्पतितस्य च । तक्षकेणापि दष्टस्य आयुर्मर्माणि रक्षति ॥ १६ ॥ क्योंकि—समुद्रमें डूबे हुएकी, पर्वतसे गिरे हुएकी और तक्षक नाम सर्पसे डसे हुएकी आयुकी प्रबलता मर्म (जीवनस्थान) की रक्षा करती है ॥ १६ ॥ नाकाले म्रियते जन्तुर्विद्धः शरशतैरपि । कुशाग्रेणैव संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति ॥ १७ ॥ जो काल न होय तो सैकड़ों बाणोंके बिंधनेसेभी प्राणी नहीं मरता है और जो काल आ जाय तो केवल कुशाकी नोंकसे छूतेही मर जाता है ॥ १७ ॥

-१९ ] दैवकी समस्या ८९ अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति । जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे न जीवति ॥ १८ ॥ दैवसे रक्षा किया हुआ, विना रक्षाके भी ठहरता ( बच जाता ) है, और अच्छी तरह रक्षा किया हुआ भी, दैवका मारा हुआ नहीं बचता है, जैसे वनमें छोड़ा हुआ सहायहीनभी जीता रहता है, घर पर कई उपाय करनेसेभी नहीं जीता है ॥ १८ ॥ ततो दिनेषु गच्छत्सु संजीवकः स्वेच्छाहारविहारं कृत्वारण्यं भ्राम्यन् हृष्टपुष्टाङ्गो बलवन्ननाद । तस्मिन्वने पिङ्गलकनामा सिंहः स्वभुजोपार्जितराज्यसुखमनुभवन्निवसति । फिर कितनेही दिनोंके बाद संजीवक अपनी इच्छानुसार खाता पीता वनमें फिरता फिरता हृष्ट पुष्ट हो कर ऊंचे स्वरसे डकराने लगा; उसी बनमें पिंगलक नाम एक सिंह अपनी भुजाओं ( स्वबल ) से पाये हुए राज्यके सुखका भोग करता हुआ रहता था. तथा चोक्तम्— नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते मृगैः । विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता ॥ १९ ॥ जैसा कहा है—मृगोंने सिंहका न तो राज्यतिलक किया और न संस्कार किया परंतु सिंह अपने आपही पराक्रमसे राज्यको पा कर मृगोंका राजा होना दिखला- ता है ॥ १९ ॥ स चैकदा पिपासाकुलितः पानीयं पातुं यमुनाकच्छमगच्छत् । तेन च तत्र सिंहेनाननुभूतपूर्वकमकालघनगर्जितमिव संजीवक- नर्दितमश्रावि । तच्छ्रुत्वा पानीयमपीत्वा स चकितः परिवृत्य स्वस्थानमागत्य किमिदमित्यालोचयस्तूष्णीं स्थितः । स च तथा- विधः करटकदमनकाभ्यामस्य मन्त्रिपुत्राभ्यां शृगालाभ्यां दृष्टः । तं तथाविधं दृष्ट्वा दमनकः करटकमाह—'सखे करटक ! किमित्य- यमुदकार्थी स्वामी पानीयमपीत्वा सचकितो मन्दं मन्दमव-

९० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः २०- तिष्ठते ?' । करटको ब्रूते-'मित्र दमनक ! अस्मन्मतेनास्य सेवैव न क्रियते । यदि तथा भवति तर्हि किमनेन स्वामिचेष्टानिरूपणे- नास्माकम् ? यतोऽनेन राज्ञा विनाऽपराधेन चिरमवधीरिताभ्या- मावाभ्यां महद्दुःखमनुभूतम् । और वह एक दिन प्याससे व्याकुल होकर पानी पीनेके लिये यमुनाके किनारे पर गया । और वहां उस सिंहने नवीन कृन्ततुकालके मेघकी गर्जनाके समान संजीवकका डकराना सुना । यह सुन कर पानीके बिना पिये वह घबराया-सा लौट कर अपने स्थान पर आ कर 'यह क्या है ?' यह सोचता हुआ चुपसा बैठ गया । और उसके मंत्रीके बेटे दमनक और करटक दो गीदड़ोंने उसे वैसा बैठा देखा । उसको इस दशामें देख कर दमनकने करटकसे कहा-'भाई करटक ! यह क्या बात है कि, प्यासा स्वामी पानीको बिना पिये डरसे धीरे धीरे आ बैठा है ?' करटक बोला-'भाई दमनक ! हमारी समझसे तो इसकी सेवाही नहीं की जाती है । जो ऐसे बैठा भी है तो हमें स्वामीकी चेष्टाका निर्णय करनेसे क्या प्रयोजन है ? क्योंकि इस राजासे बिना अपराध बहुत काल तक तिरस्कार किये गये हम दोनोंने बड़ा दुःख सहा है ॥ सेवया धनमिच्छद्भिः सेवकैः पश्य यत्कृतम् । स्वातन्त्र्यं यच्छरीरस्य मूढैस्तदपि हारितम् ॥ २० ॥ सेवासे धनको चाहने वाले सेवकोंने जो किया सो देख कि शरीरकी स्वतंत्र- ताभी मूर्खोंने हार दी है ॥ २० ॥ अपरं च,— शीतवातातपक्लेशान्सहन्ते यान्पराश्रिताः । तदंशेनापि मेधावी तपस्तप्त्वा सुखी भवेत् ॥ २१ ॥ और दूसरे—जो पराधीन हो कर जाड़ा, हवा और धूपमें दुःखोंको सहते हैं उस दुःखके छोटेसे छोटे भागसे तप ( खलही दुःख सहन ) करके बुद्धिमान् सुखी हो सकता है ॥ २१ ॥ अन्यच्च,— एतावज्जन्मसाफल्यं यदनायत्तवृत्तिता । ये पराधीनतां यातास्ते वै जीवन्ति के मृताः ॥ २२ ॥

-२६ ] पराधीन जीवनकी निन्दा ९१ और-स्वाधीनताका होनाही जन्मकी सफलता है, और जो पराधीन होने परभी जीते ( कहलाते ) हैं तो मरे कौनसे हैं ? अर्थात् वेही मरेके समान हैं जो पराधीन हो कर रहते हैं ॥ २२ ॥ अपरं च,— एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ वद् मौनं समाचर । एवमाशाग्रहग्रस्तैः क्रीडन्ति धनिनोऽर्थिभिः ॥ २३ ॥ और दूसरे-धनवान् पुरुष, आशारूपी ग्रहसे भरमाये गये हुए याचकोंके साथ, 'इधर आ, चला जा, बैठ जा, खड़ा हो, बोल, चुपसा रह' इस तरह खेल किया करते हैं ॥ २३ ॥ किंच,— अबुधैरर्थलाभाय पण्यस्त्रीभिरिव स्वयम् । आत्मा संस्कृत्य संस्कृत्य परोपकरणीकृतः ॥ २४ ॥ और जैसे वेश्या दूसरोंके लिये सिंगार करती है वैसेही मूर्खोंनेभी धनके लाभ- के लिये अपनी आत्माको संस्कार करके हृष्ट पुष्ट बनवा कर पराये उपकारके लिये कर रक्खी है ॥ २४ ॥ किंच,— या प्रकृत्यैव चपला निपतत्यशुचावपि । स्वामिनो बहु मन्यन्ते दृष्टिं तामपि सेवकाः ॥ २५ ॥ और जो दृष्टि स्वभावहीसे चपल है और मल, मूत्र आदि नीची वस्तुओं परभी गिरती है ऐसी स्वामीकी दृष्टिका सेवकलोग बहुत गौरव करते हैं ॥ २५ ॥ अपरं च,— मौनान्मूर्खः प्रवचनपटुर्वातुलो जल्पको वा क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः । धृष्टः पार्श्वे वसति नियतं दूरतश्चाप्रगल्भः सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ॥ २६ ॥ और चुपचाप रहनेसे मूर्ख, बहुत बातें करनेमें चतुर होनेसे उन्मत्त अथवा वातून, क्षमाशील होनेसे डरपोक, न सहन सकनेसे नीतिरहित (अकुलीन), सर्वदा पास रहनेसे ढीठ, और दूर रहनेसे घमंडी कहलाता है. इसलिये सेवाका धर्म बड़ा रहस्यमय है ( सब क्लेश सहन करनेवाले ) योगियोंसेभी पहचाना नहीं जा सका है ॥ २६ ॥

९२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः २७- विशेषतश्च,— प्रणमत्युन्नतिहेतोर्जीवितहेतोर्विमुञ्चति प्राणान् । दुःखीयति सुखहेतोः, को मूढः सेवकादन्यः ? ॥ २७ ॥ और विशेष बात यह है कि—जो उन्नतिके लिये झुकता है, जीनेके लिये प्राणका भी त्याग करता है, और सुखके लिये दुःखी होता है, ऐसा सेवकको छोड़ और कौन भला मूर्ख हो सकता है?' ॥ २७ ॥ दमनको ब्रूते—'मित्र ! सर्वथा मनसापि नैतत्कर्तव्यम् । यतः,— कथं नाम न सेव्यन्ते यत्नतः परमेश्वराः । अचिरेणैव ये तुष्टाः पूरयन्ति मनोरथान् ॥ २८ ॥ दमनक बोला–'मित्र ! कभी यह बात मनसेभी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि स्वामियोंकी सेवा यत्नसे क्यों नहीं करनी चाहिये, जो सेवासे प्रसन्न हो कर शीघ्र (सेवकके) मनोरथ पूरे कर देते हैं ॥ २८ ॥ अन्यच्च पश्य,— कुतः सेवाविहीनानां चामरोद्धूतसंपदः । उद्दण्डधवलच्छत्रं वाजिवारणवाहिनी' ॥ २९ ॥ और दूसरे देखो—स्वामीकी सेवा नहीं करने वालोंको चमरके डुलावसे युक्त ऐश्वर्य तथा ऊंचे दंड वाले श्वेत छत्र और घोड़े हाथियोंकी सेना कहां धरी है ? ॥ २९ ॥ करतको ब्रूते—'तथापि किमनेनास्माकं व्यापारेण ? यतोऽव्यापा- रेषु व्यापारः सर्वथा परिहरणीयः । करटक बोला–'तोभी हमको इस कामसे क्या प्रयोजन है ? क्योंकि अयोग्य कामोंमें व्यापार ( अनधिकृत चेष्टा ) करना सर्वथा त्यागनेके योग्य है ॥ पश्य,— अव्यापारेषु व्यापारं यो नरः कर्तुमिच्छति । स भूमौ निहतः शेते कीलोत्पाटीव वानरः' ॥ ३० ॥ देख–जो मनुष्य नहीं करनेके कामोंमें (पड़ना) व्यापार करना चाहता है वह कीलके उखाड़ने वाले बंदरकी तरह धरती पर मृत्युशायी होता है ॥ ३० ॥ दमनकः पृच्छति—कथमेतत् ?' । करटकः कथयति— दमनक पूछने लगा—'यह कथा कैसे है?' तब करटक कहने लगा।—

कथा २

-३१ ] अनधिकृत चेष्टाका परिणाम ९३

कथा २ [ अनधिकृत चेष्टा करने वाले बंदरकी कहानी २ ] 'अस्ति मगधदेशे धर्मारण्यसंनिहितवसुधायां शुभदत्तनाम्ना कायस्थेन विहारः कर्तुमारब्धः । तत्र करपत्रक्षार्यमाणैकस्तम्भस्य कियद्दूरस्फटितस्य काष्ठखण्डद्वयमध्ये कीलकः सूत्रधारेण निहितः । तत्र बलवान्वानरयूथः क्रीडन्नागतः । एको वानरः कालप्रेरित इव तं कीलकं हस्ताभ्यां धृत्वोपविष्टः । तत्र तस्य मुष्कद्वयं लम्बमानं काष्ठखण्डद्वयाभ्यन्तरे प्रविष्टम् । अनन्तरं स च सहजचपलतया महता प्रयत्नेन तं कीलकमाकृष्टवान् । आकृष्टे च कीलके चूर्णिताण्डद्वयः पञ्चत्वं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि—"अव्यापारेषु व्यापारम्" इत्यादि' ॥ दमनको ब्रूते— 'तथापि स्वामिचेष्टानिरूपणं सेवकेनावश्यं करणीयम् ।'— करटको ब्रूते—'सर्वस्मिन्नधिकारे य एव नियुक्तः प्रधानमन्त्री स करोतु । यतोऽनुजीविना पराधिकारचर्चा सर्वथा न कर्तव्या । 'मगध देशमें धर्मारण्यके पास किसी प्रदेशमें शुभदत्त नामक कायस्थने एक मन्दिर बनवाना आरंभ किया । वहां आरेसे चीरा हुआ लट्ठा जो कितनीही दूर तक फट रहा था; उस काटके दोनों भागोंके बीचमें बढ़ईने कील ठोक दी थी । वहां बलवान् बन्दरोंका झुंड खेलता हुआ आया । एक बन्दर मृत्युसे प्रेरित हुएके समान उस लकड़ीकी खूंटीको दोनों हाथोंसे पकड़ कर बैठ गया । वहां उसके लटकते हुए दोनों अंडकोश, उस काटके दोनों भागोंकी संदमें लटक पड़े और फिर उसने स्वभावकी चंचलतासे बडे बड़े उपाय करके खूंटीको खींच लिया, और खूंटीको खींचतेही उसके दोनों अंडकोश पिचले जाने पर वह मर गया ॥ इसलिये मैं कहता हूं—"विना कामके कामोंमें पड़ना" इत्यादि' ॥ दमनकने कहा—'तोभी सेवकको स्वामीके कामका विचार अवश्य करना चाहिये ॥' करटक बोला—'जो सब काम पर अधिकारी प्रधान मंत्री हो वही करे । क्योंकि सेवकको पराये कामकी चर्चा कभी नहीं करनी चाहिये ॥ पश्य,— पराधिकारचर्चां यः कुर्यात् स्वामिहितेच्छया । स विषीदति चीत्काराद्गर्दभस्ताडितो यथा ॥ ३१ ॥

दमनक पूछने लगा— ‘यह कथा कैसे है ?’ करटक कहने लगा ।—

९४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ३१- देख, — जो स्वामीके हितकी इच्छासे पराये अधिकारकी चर्चा करता है वह रेंकनेसे मारे गये गधेकी तरह मारा जाता है ॥ ३१ ॥ दमनकः पृच्छति — ‘कथमेतत् ?’ । करटको ब्रूते— दमनक पूछने लगा— ‘यह कथा कैसे है ?’ करटक कहने लगा ।— कथा ३ [ धोबी, धोबन, गधा और कुत्तेकी कहानी ३ ] ‘अस्ति वाराणस्यां कर्पूरपटको नाम रजकः । स चाभिनववय- स्कया वध्वा सह चिरं निधुवनं कृत्वा निर्भरमालिङ्गय प्रसुप्तः । तदनन्तरं तद्गृहद्रव्याणि हर्तुं चौरः प्रविष्टः । तस्य प्राङ्गणे गर्दभो बद्धस्तिष्ठति, कुक्कुरश्चोपविष्टोऽस्ति । अथ गर्दभः श्वानमाह— ‘सखे ! भवतस्तावदयं व्यापारः । तत्किमिति त्वमुच्चैः शब्दं कृत्वा स्वामिनं न जागरयसि ?’ कुक्कुरो ब्रूते—‘भद्र ! मम नियोगस्य चर्चा त्वया न कर्तव्या । त्वमेव किं न जानासि यथा तस्याहर्निशं गृहरक्षां करोमि । यतोऽयं चिरान्निर्वृतो ममोपयोगं न जानाति । तेनाधुनापि ममाहारदाने मन्दादरः । यतो विना विधुरदर्शनं स्वामिन उपजीविषु मन्दादरा भवन्ति ।’ ‘बनारसमैं एक कर्पूरपटक नामक धोबी रहता था। वह नवजवान अपनी स्त्रीके साथ बहुत काल तक विलास करके, और अत्यन्त छातीसे चिपटा कर सो गया । इसके बाद उसके घरके द्रव्यको चुरानेके लिये चोर अंदर घुसा । उसके आंग- नमें एक गधा बंधा था और एक कुत्ता भी बैठा था । इतनेमें गधेने कुत्तेसे कहा-‘मित्र ! यह तेरा काम है, इसलिये क्यों नहीं ऊंचे शब्दसे भोंक कर स्वामीको जगाता है ?’ कुत्ता बोला-‘भाई ! मेरे कामकी चर्चा तुझे नहीं करनी चाहिये, और क्या तू सचमुच नहीं जानता है कि जिसप्रकार मैं उनके घरकी रखवाली रातदिन करता हूं, पर वैसा वह बहुत कालसे निश्चित होकर मेरे उपयोगको नहीं मानता है; इसलिये आजकल वह मेरे आहार देनेमें भी आदर ( फिक्र ) कम करता है । क्योंकि बिना आपत्तिके देखें स्वामी सेवकों पर थोड़ा आदर करते हैं ।

-३४ ] अनधिकृत चेष्टाका उपाख्यान ९५ गर्दभो ब्रूते—‘शृणु रे बर्बर ! याचते कार्यकाले यः स किंभृत्यः स किंसुहृत् ।’ गधा बोला—‘सुन रे मूर्ख ! जो कामके समय पर माँगे वह निन्दित सेवक और निन्दित मित्र है.’ कुकुरो ब्रूते— ‘भृत्यान्संभाषयेद्यस्तु कार्यकाले स किंप्रभुः ॥ ३२ ॥ कुत्ता बोला-‘जो काम अटकने पर सेवकोंसे ( केवल अपने स्वार्थके खातर ) मीठी मीठी बातें करे वह तो निन्दित स्वामी है ॥ ३२ ॥ यतः,— आश्रितानां भृतौ स्वामिसेवायां धर्मसेवने । पुत्रस्योत्पादने चैव न सन्ति प्रतिहस्तकाः’ ॥ ३३ ॥ क्योंकि आश्रितोंके पालन-पोषणमें, स्वामीकी सेवामें, धर्मकी सेवा (आचरण) करनेमें, और पुत्रके उत्पन्न करनेमें, प्रतिनिधि (एवजी) नहीं होते हैं अर्थात् ये काम अपने आपही करनेके हैं, दूसरेसे करानेके योग्य नहीं हैं’ ॥ ३३ ॥ ततो गर्दभः सकोपमाह—‘अरे दुष्टमते ! पापीयांस्त्वं यद्विपत्तौ स्वामिकार्यं उपेक्षां करोषि । भवतु तावत्, यथा स्वामी जाग- रिष्यति तन्मया कर्तव्यम् । फिर गधा झुंझला कर बोला-‘अरे दुष्टबुद्धि ! तू बड़ा पापी है, कि विपत्तिमें स्वामीके कामकी अवहेलना करता है । ठीक, जिस किसी भी प्रकार से स्वामी जग जावे ऐसा मैं तो अवश्य करूँगा ॥ यतः,— पृष्ठतः सेवयेदर्कं जठरेण हुताशनम् । स्वामिनं सर्वभावेन परलोकममायया’ ॥ ३४ ॥ क्योंकि—पीठके बल धूप खाय, पेटके बल अग्निसे तापे, स्वामीकी सब प्रकारसे (वफादारीसे) और परलोककी बिना कपटसे सेवा करनी चाहिये ॥३४॥ इत्युक्त्वातीव चीत्कारशब्दं कृतवान् । ततः स रजकस्तेन ची- त्कारेण प्रबुद्धो निद्राभङ्गकोपादुत्थाय गर्दभं लगुडेन ताडया- मास । तेनासौ पञ्चत्वमगमत् । अतोऽहं ब्रवीमि—"पराधि-

९६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ३५-

कारचर्चाम्" इत्यादि ॥ पश्य । पशूनामन्वेषणमेवास्मन्नियोगः । स्वनियोगचर्चा क्रियताम् । ( विमृश्य) किंत्वद्य तया चर्चया न प्रयोजनम् । यत आवयोर्भक्षितशेषाहारः प्रचुरोऽस्ति ।' दमनकः सकोपमाह—'कथमाहारार्थी भवान्केवलं राजानं सेवते ? एतदयुक्तमुक्तं त्वया । यह कह कर उसने अत्यंत रेंकनेका शब्द किया । तब वह धोबी उसके चिल्लानेसे जाग उठा और नींद टूटनेके क्रोधके मारे उठ कर लकड़ीसे गधेको मारा कि जिससे वह मर गया । इसलिये मैं कहता हूं-"पराये अधिकारकी चर्चाको" इत्यादि ॥ देख-पशुओंका ढूंढना हमारा काम है ॥ अपने कामकी चर्चा करो । ( सोच कर ) परन्तु आज उस चर्चासे कुछ प्रयोजन नहीं ॥ क्योंकि अपने दोनोंके भोजनसे बचा हुआ आहार बहुत धरा है ।' दमनक क्रोधसे बोला-‘क्या तुम केवल भोजनकेही अर्थी हो कर राजाकी सेवा करते हो ? यह तुमने अयोग्य कहा । यतः,— सुहृदामुपकारकारणा- द्विषतामप्यपकारकारणात् । नृपसंश्रय इष्यते बुधै- र्जठरं को न बिभर्ति केवलम् ॥ ३५ ॥ क्योंकि-मित्रोंके उपकारके लिये, और शत्रुओंके अपकारके लिये चतुर मनुष्य राजाका आश्रय करते हैं (याने अपने मित्र या आप्तके हितके लिये और शत्रुके नाशके लियेही राजाश्रय किया जाता है ) और केवल पेट कौन नहीं भर लेता हैं ? अर्थात् सभी भरते हैं ॥ ३५ ॥ जीविते यस्य जीवन्ति विप्रा मित्राणि बान्धवाः । सफलं जीवितं तस्य आत्मार्थे को न जीवति ? ॥ ३६ ॥ जिसके जीनेसे ब्राह्मण, मित्र और भाई जीते हैं उसीका जीवन सफल है और केवल अपने (स्वार्थके) लिये कौन नहीं जीता है ? ॥ ३६ ॥ अपि च,— यस्मिञ्जीवति जीवन्ति बहवः स तु जीवतु । काकोऽपि किं न कुरुते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् ? ॥ ३७ ॥

-४१ ] सेवाधर्मकी निन्दा और पराक्रमकी प्रशंसा ९७ औरभी-जिसके जीनेसे बहुतसे लोग जिये वह तो सचमुच जिया, और यों तो काकभी क्या चोंचसे अपना पेट नहीं भर लेता है ? ॥ ३७ ॥ पश्य,— पञ्चभिर्याति दासत्वं पुराणैः कोऽपि मानवः । कोऽपि लक्षैः कृती कोऽपि लक्षैरपि न लभ्यते ॥ ३८ ॥ देख-कोई मनुष्य पांच पुराण में दासपनेको करने लगता है, कोई लाख में करता है और कोई एक लाखमेंभी नहीं मिलता है ॥ ३८ ॥ अन्यच्च,— मनुष्यजातौ तुल्यायां भृत्यत्वमतिगर्हितम् । प्रथमो यो न तत्रापि स किं जीवत्सु गण्यते ? ॥ ३९ ॥ और दूसरे-मनुष्योंको समान जातिमें सेवकाई काम करना अति निन्दित है और सेवकोंमेंभी जो प्रथम अर्थात् सबका मुखिया नहीं है क्या वह जीते हुओंमें गिना जा सकता है ? अर्थात् उसका जीना और मरना समान है ॥ ३९ ॥ तथा चोक्तम्,— वाजिवारणलोहानां काष्ठपाषाणवाससाम् । नारीपुरुषतोयानामन्तरं महदन्तरम् ॥ ४० ॥ जैसा कहा है-घोड़ा, हाथी, लोहा, काष्ठ, पत्थर, वस्त्र, स्त्री, पुरुष और जल इस प्रत्येकमें बड़ा अन्तर है ॥ ४० ॥ तथा हि, स्वल्पमप्यतिरिच्यते । और उसी प्रकार-थोड़ा बहुतभी गिना जाता है. स्वल्पस्नायुवसावशेषमलिनं निर्मांसमप्यस्थिकं श्वा लब्ध्वा परितोषमेति न भवेत्तस्य क्षुधः शान्तये । सिंहो जम्बुकमङ्कगं तमपि त्यक्त्वा निहन्ति द्विपं, सर्वः कृच्छ्रगतोऽपि वाञ्छति जनः सत्त्वानुरूपं फलम्॥४१॥ कुत्ता थोड़ी नस तथा चरबीसे मलिन विना मांसकी हड्डीको पा कर उसीमें संतोष कर लेता है, कुछ उससे उसकी भूख दूर नहीं होती है; और सिंह गोदमें आये हुए सियारको भी छोड़ कर हाथीको मारता है इसलिये सब प्राणी क्लेशको सह कर भी अपने पराक्रमके अनुसार फलकी इच्छा करते हैं ॥ ४१ ॥ १ पुराण=८० कौडी याने एक पैसा; ६४ कौडीका एक पैसा माना जाता है. हि० ७

९८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ४२- अपरं च, सेव्यसेवकयोरन्तरं पश्य,— लाङ्गूलचालनमधश्चरणावपातं भूमौ निपत्य वदनोदरदर्शनं च । श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुंगवस्तु धीरं विलोकयति चाटुशतैश्च भुङ्क्ते ॥ ४२ ॥ और दूसरे—स्वामी और सेवकका भेद देखो-कुत्ता, टुकड़ा देने वालोंके सामने पूंछको हिलाता है, उसके चरणोंमें गिरता है, धरती पर लेट कर अपना मुख और पेट दिखाया करता है, परन्तु श्रेष्ठ हाथी तो स्वामीको धीरजसे देखता है, और सौ सौ उपाय करनेसे खाता है ॥ ४२ ॥ किंच,— यज्जीव्यते क्षणमपि प्रथितं मनुष्यै- र्विज्ञानविक्रमयशोभिरभज्यमानम् । तन्नाम जीवितमिह प्रवदन्ति तज्ज्ञाः काकोऽपि जीवति चिराय बलिं च भुङ्क्ते ॥ ४३ ॥ और शास्त्रज्ञान, पराक्रम, तथा यशसे विख्यात होकर जो मनुष्य क्षणभर भी जीते हैं, उसी जीनेको इस दुनियामें पण्डित लोग सफल कहते हैं, और यों तो काकभी बहुत दिन तक जीता है और खुराक खाता है ॥ ४३ ॥ अपरं च,— यो नात्मजे न च गुरौ न च भृत्यवर्गे दीने दयां न कुरुते न च बन्धुवर्गे । किं तस्य जीवितफलेन मनुष्यलोके काकोऽपि जीवति चिराय बलिं च भुङ्क्ते ॥ ४४ ॥ और दूसरा—जो न पुत्र पर, न गुरु पर, न सेवकों पर, और न दीन बांधवों पर दया करता है उसके जीनेके फलसे मनुष्यलोकमें क्या है, और यों तो काकभी बहुत काल तक जीता है और बलि खाता है अर्थात् केवल पेट भरनाही जीवनका फल नहीं है ॥ ४४ ॥