हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ७७- और दूसरे—असमर्थ भक्तसे अथवा अपकारी समर्थसे क्या प्रयोजन निकलता है ? सो हे राजा ! मेरे समान भक्त और काम करनेमें समर्थका अपमान आपको नहीं करना चाहिये ॥ ७६ ॥ यतः,— अवज्ञानाद्राज्ञो भवति मतिहीनः परिजन- स्ततस्तत्प्रामाण्याद्भवति न समीपे बुधजनः । बुधैस्त्यक्ते राज्ये न हि भवति नीतिर्गुणवती विपन्नायां नीतौ सकलमवशं सीदति जगत् ॥ ७७ ॥ क्योंकि राजाके अपमान करनेसे आपसके ( परिवारी ) लोग बुद्धिहीन हो जाते हैं, पीछे उसके प्रमाणसे ( अर्थात् मेराभी यह अपमान करेगा यह सोच कर ) पण्डितजन उसके पास नहीं आते हैं । पण्डितोंसे छोड़े हुए राज्यमें नीति दोष- रहित नहीं होती है, और नीतिके बिगड़नेसे सब संसार बेवश होकर नष्ट हो जाता है ॥ ७७ ॥ अपरं च,— जनं जनपदा नित्यमर्चयन्ति नृपार्चितम् । नृपेणावमतो यस्तु स सर्वैरवमन्यते ॥ ७८ ॥ और दूसरे—राजासे सन्मान किये हुए मनुष्यकी प्रजा सर्वदा आदर करती है और राजासे अपमान किये गये ( पुरुष ) का सब अपमान करते हैं ॥ ७८ ॥ किं च,— बालादपि ग्रहीतव्यं युक्तमुक्तं मनीषिभिः । रवेरविषये किं न प्रदीपस्य प्रकाशनम् ?' ॥ ७९ ॥ और पण्डितोंको बालकसेभी योग्य बात ग्रहण करनी चाहिये, जैसे सूर्यके नहीं निकलने पर क्या दीपकका उजाला नहीं होता है ? ॥ ७९ ॥ पिङ्गलकोऽवदत्—'भद्र दमनक ! किमेतत् ? त्वमस्मदीयप्रधा- नामात्यपुत्र इयन्तं कालं यावत्कुतोऽपि खलवाक्यान्नागतोऽसि ? इदानीं यथाभिमतं ब्रूहि ।' दमनको ब्रूते—'देव ! पृच्छामि किंचित् । उच्यताम् । उदकार्थी स्वामी पानीयमपीत्वा किमिति विस्मित इव तिष्ठति ?' । पिङ्गलकोऽवदत्—'भद्रमुक्तं त्वया । किंन्त्वेतद्रहस्यं वक्तुं काचिद्विश्वासभूमिर्नास्ति । तथापि निभृतं