भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 129

-८० ] आवाजसे डरे हुए सिंहकी बयान १०९ कृत्वा कथयामि । शृणु; संप्रति वनमिदमपूर्वसत्त्वाधिष्ठितमतो- ऽस्माकं त्याज्यम् । अनेन हेतुना विस्मितोऽस्मि । तथा च श्रुतो मयापि महानपूर्वशब्दः । शब्दानुरूपेणास्य प्राणिनो महता बलेन भवितव्यम् ।' दमनको ब्रूते- 'देव ! अस्ति तावदयं महान्भयहेतुः स शब्दोऽस्माभिरप्याकर्णितः । किंतु स किंमन्त्री यः प्रथमं भूमि- त्यागं पश्चाद्युद्धं चोपदिशति । अस्मिन्कार्यसंदेहे भृत्यानामुपयोग एक ज्ञातव्यः । पिंगलक बोला-'प्यारे दमनक ! यह क्या बात है ? तू हमारे मुख्य मंत्रीका पुत्र होकर इतने समय तक किसी दुष्टके सिखाये भलायेसे नहीं आया ? अब जो तेरा मनोरथ हो कह दे ।' दमनक बोला-'महाराज ! कुछ पूछता हूं, कहिये । स्वामी प्यासे होकर पानीके विना पिये क्यों घबराये हुएसे बैठे हैं ?' पिङ्गलक बोला-'तूने अच्छी बात पूछी परंतु यह गुप्त बात कहनेके लिये कोई भरोसेका मनुष्य नहीं है । तोभी यहां एकांत होनेसे कहता हूं, सुन; इस बनमें अब एक अपूर्व जीव आ कर बसा है और हमें त्यागना पड़ेगा इस कारण मैं घबराया हुआ-सा हूं और मैंने बड़ा भारी एक अपूर्व शब्दभी सुना है । और शब्दके अनुसार इस प्राणीका बड़ा बल होगा ।' दमनक बोला-'महाराज ! यह तो बड़े भयका कारण है । वह शब्द तो मैंनेभी सुना है परन्तु वह बुरा मंत्री है कि जो पहले धरती छोड़नेका और पीछे लड़नेका उपदेश देता है । इस कामके संदेहमेंही सेवकोंके कार्य करनेकी चतुरता जाननी चाहिये ॥ यतः,- बंधुस्त्रीभृत्यवर्गस्य बुद्धेः सत्त्वस्य चात्मनः । आपन्निकषपाषाणे नरो जानाति सारताम्' ॥ ८० ॥ क्योंकि-बांधव (भाई या संबंधी) स्त्री, सेवक, अपनी बुद्धि और अपना बल इनकी उत्कर्षताको मनुष्य आपित्तरूपी कसौटी पर परीक्षा करता है' ॥ ८० ॥ सिंहो ब्रूते— 'भद्र ! महती शङ्का मां बाधते ।' दमनकः पुनराह स्वगतम्— 'अन्यथा राज्यसुखं परित्यज्य स्थानान्तरं गन्तुं कथं मां संभाषसे ?' । प्रकाशं ब्रूते- 'देव ! यावदहं जीवामि तावद्भयं न कर्तव्यम् । किंतु करटकादयोऽप्याश्वास्यन्तां यस्मादापत्प्रतीकार- काले दुर्लभः पुरुषसमवायः ।'