हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें११० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ८१- सिंह बोला—'हे शुभचिंतक ! मुझे बड़ी शंका दुःख दे रही है।' फिर दमनक अपने जीमें कहने लगा—'जो यह न होता तो राज्यका सुख छोड़ कर दूसरे स्थानमें जानेके लिये मुझसे क्यों कहते हो?' प्रकट बोला-'महाराज ! जब तक मैं जीता हूं तब तक भय नहीं करना चाहिये, परन्तु करटक आदिकोभी भरोसा दे दीजिये, क्योंकि विपत्तिके प्रतिकार ( उपाय)के समय पुरुषोंका इकट्ठा होना दुर्लभ है।' ततस्तौ दमनककरटकौ राज्ञा सर्वस्वेनापि पूजितौ भयप्रती- कारं प्रतिज्ञाय चलितौ । करटको गच्छन् दमनकमाह—'सखे ! किं शक्यप्रतीकारो भयहेतुरशक्यप्रतीकारो वेति न ज्ञात्वा भयोपशमं प्रतिज्ञाय कथमयं महाप्रसादो गृहीतः ? यतोऽनुप- कुर्वाणो न कस्याप्युपायनं गृह्णीयाद्विशेषतो राज्ञः । तब राजाने तन, मन, और धनसे उन दोनोंका सत्कार किया और वे दोनों दमनक, करटक भयके उपायकी प्रतिज्ञा करके चले । चलते चलते करटकने दमनकसे कहा—'मित्र ! भयके कारणका उपाय होनेके योग्य है अथवा उपाय न होनेके योग्य है यह बिनाही जाने भयके दूर करनेकी प्रतिज्ञा करके कैसे यह महाप्रसाद ( वस्त्र, आभूषण इत्यादि ) लेलिया ? क्योंकि अनुपकारी ( बिना उपाय किये किसी)की भी भेंट नहीं लेनी चाहिये और विशेष करके राजाकी ।' पश्य,— यस्य प्रसादे पद्मास्ते विजयश्च पराक्रमे । मृत्युश्च वसति क्रोधे सर्वतेजोमयो हि सः ॥ ८१ ॥ देखो—जिसकी प्रसन्नतामें लक्ष्मी रहती है, पराक्रममें जय रहता है, और क्रोधमें मृत्यु रहती है, वह ( राजा ) सचमुच तेजस्वी होता है ॥ ८१ ॥ तथा हि,— बालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः । महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति' ॥ ८२ ॥ और बालक होने पर भी राजाका मनुष्य समझकर अपमान नहीं करना चाहिये, क्योंकि यह मनुष्यके रूपसे स्वयं बड़ी देवता है' ॥ ८२ ॥