हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें१२० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १०२- सदामात्यो न साध्यः स्यात्समृद्धः सर्व एव हि । सिद्धानामयमादेश ऋद्धिश्चत्तविकारिणी ॥ १०२ ॥ धनसे बढ़े हुए सब मंत्री लोग निश्चय करके अंतमें असाध्य अर्थात् स्वतंत्र हो जाते हैं, क्योंकि ऐश्वर्य चित्तको विकृत करनेवाला (दानतको बिगाड़नेवाला) है, यह महात्माओंका वाक्य है ॥ १०२ ॥ प्राप्तार्थग्रहणं द्रव्यपरीवर्त्तोऽनुरोधनम् । उपेक्षा बुद्धिहीनत्वं भोगोऽमात्यस्य दूषणम् ॥ १०३ ॥ मिले हुए धनका भार लेना, द्रव्यका अदलबदल करना, अनुरोध (वार २ द्रव्य मांगना ) सब कामोंमें उदासीन (आलकस), बुद्धिहीन होना और परस्त्रियोंके साथ भोगमें लगा रहना यह मंत्रीके दूषण हैं ॥ १०३ ॥ नियोग्यर्थग्रहापायो राज्ञां नित्यपरीक्षणम् । प्रतिपत्तिप्रदानं च तथा कर्मविपर्ययः ॥ १०४ ॥ और राजाके संचय किये हुए धनका नाश, राजाओंकी नित्य परीक्षा, अर्थात् प्रसन्न है या अप्रसन्न है, यह जानना और प्रिय वस्तुका दे देना, और करनेके योग्य काममें आलस्य करना येभी मंत्रीके दूषण हैं ॥ १०४ ॥ निपीडिता वमन्त्युच्चैरन्तःसारं महीपतेः । दुष्टव्रणा इव प्रायो भवन्ति हि नियोगिनः ॥ १०५ ॥ अधिकारी लोग अधिक दबानेसे राजाके भीतरके भेदको सर्वत्र ऐसे उगलते फिरते हैं कि जैसे फोड़ा अधिक दबानेसे भीतरकी राद इत्यादि उगल देता है ॥ १०५ ॥ मुहुर्नियोगिनो बाध्या वसुधारा महीपते ! । सकृत्किं पीडितं स्नानवस्त्रं मुञ्चेद्रुतं पयः ? ॥ १०६ ॥ और हे राजा ! अधिकारीके जोड़े हुए धनकी वार वार परीक्षा करनी चाहिये । क्योंकि एकवार निचोड़ा हुआ नहानेका वस्त्र क्या शीघ्र जलको छोड़ देता है ? अर्थात् कभी नहीं छोड़ता है ॥ १०६ ॥ एतत्सर्वं यथावसरं ज्ञात्वा व्यवहर्त्तव्यम् ।' सिंहो ब्रूते-'अस्ति तावदेवम्, किंन्त्वेतौ सर्वथा न मम वचनकारिणौ ।' स्तब्धकर्णो ब्रूते-'एतत्सर्वमनुचितं सर्वथा ।