भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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-१०९ ] अप्रतिहत राजनीतिकी जरूरी १२१ यह सब जैसा अवसर हो वैसा जान कर काम करना चाहिये।' सिंह बोला-'यह तो है ही, पर ये सर्वथा मेरी बातको नहीं माननेवाले हैं।' स्तब्धकर्ण बोला-'यह सब प्रकारसे अनुचित है। यतः,— आज्ञाभङ्गकरान् राजा न क्षमेत् स्वसुतानपि । विशेषः को नु राज्ञश्च राज्ञश्चित्रगतस्य च ॥ १०७ ॥ क्योंकि—राजा आज्ञाभंग करनेवाले अपने पुत्रोंकोभी क्षमा न करें, क्योकि ऐसा न करनेसे पराक्रमी राजामें और चित्रमें लिखे हुए राजामें क्या भेद है ? अर्थात् ऐसा राजा किसी कामका नहीं होता है ॥ १०७ ॥ स्तब्धस्य नश्यति यशो विषमस्य मैत्री नष्टेन्द्रियस्य कुलमर्थपरस्य धर्मः । विद्याफलं व्यसनिनः कृपणस्य सौख्यं राज्यं प्रमत्तसचिवस्य नराधिपस्य ॥ १०८ ॥ निष्क्रिय मनुष्यका यश, चंचल चित्तवालेकी मित्रता, दुष्ट इन्द्रियवालेका कुल, धनके लोभीका धर्म, द्यूत आदि व्यसनमें आसक्तका विद्याफल, कृपणका सुख, और विवेकहीन मंत्रीवाले राजाका राज्य नष्ट हो जाता है ॥ १०८ ॥ अपरं च,— तस्करेभ्यो नियुक्तेभ्यः शत्रुभ्यो नृपवल्लभात् । नृपतिर्निजलोभाच्च प्रजा रक्षेत्पितेव हि ॥ १०९ ॥ और दूसरे-राजाको चोरोंसे, सेवकोंसे, शत्रुओंसे अपने प्रिय मंत्री आदिसे और अपने लोभसे, पिताके समान प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये ॥ १०९ ॥ भ्रातः ! सर्वथाऽस्सद्वचनं क्रियताम् । व्यवहारोऽप्यस्माभिः कृत एव । अयं संजीवकः सस्यभक्षकोऽर्थाधिकारे नियुज्यताम् ।' एतद्वचनात्तथानुष्ठिते सति तदारभ्य पिङ्गलक-संजीवकयोः सर्व- बन्धुपरित्यागेन महता स्नेहेन कालोऽतिवर्तते । ततोऽनुजीविना- मप्याहारदाने शैथिल्यदर्शनाद्दमनक-करटकावन्योन्यं चिन्तयतः । तदाह दमनकः करटकम्—'मित्र किं कर्तव्यम् ? आत्मकृतोऽयं दोषः । स्वयं कृतेऽपि दोषे परिदेवनमप्यनुचितम् ।