भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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-१२९ ] दमनकका धूर्ततायुक्त भाषण १३५ पिंगलकने आदरसे कहा-'तू क्या कहना चाहता है?' दमनकने कहा-'यह संजीवक तुम्हारे ऊपर अयोग्य काम करने वाला-सा दीखता है और मेरे सामने महाराजकी तीनों १शक्तियोंकी निन्दा करके राज्यकोही छीनना चाहता है ॥ यह सुन कर पिंगलक भय और आश्चर्यसे मान कर चुप हो गया ॥ दमनक फिर बोला-'महाराज ! सब मंत्रियोंको छोड़ कर एक इसीको जो तुमने सर्वाधिकारी (सब कामका अधिकारी ) बना रक्खा है वही दोष है ॥ यतः,— अत्युच्छ्रिते मन्त्रिणि पार्थिवे च विष्टभ्य पादावुपतिष्ठते श्रीः । सा स्त्रीस्वभावादसहा भरस्य तयोर्द्वयोरेकतरं जहाति ॥ १२७ ॥ क्योंकि—राजलक्ष्मी राजाके तथा मंत्रीके अधिक उन्नति पाने पर चरणोंमें गिर कर (दोनोंकी) सेवा करती है और फिर स्त्रीके स्वभावसे उन दोनोंके भारको नहीं सहन करती हुई दोनोंमेंसे एकको छोड़ देती है ॥ १२७ ॥ अपरं च,— एकं भूमिपतिः करोति सचिवं राज्ये प्रमाणं यदा तं मोहाच्छ्रयते मदः स च मदालस्येन निर्भिद्यते । निर्भिन्नस्य पदं करोति हृदये तस्य स्वतन्त्रस्पृहा स्वातन्त्र्यस्पृहया ततः स नृपतेः प्राणान्तिकं द्रुह्यति ॥१२८॥ और दूसरे-जब राजा राज्य पर एक मंत्रीको (सब कामका अधिकारी) मुखिया कर देता है तब उसे अभिमानसे मद हो जाता है और मदान्धताके आलस्यसे आपसमें फूट हो जाती है और फिर फूट होनेसे उसके हृदयमें स्वतन्त्रताका अभिलाष होता है, अर्थात् सर्वश्रेष्ठ होना चाहता है, और फिर स्वातन्त्र्यके लाभकी इच्छासे वह मंत्री राजाके प्राण लेने तक की शत्रुता करता है ॥ १२८ ॥ अन्यच्च,— विषदिग्धस्य भक्तस्य दन्तस्य चलितस्य च । अमात्यस्य च दुष्टस्य मूलादुद्धरणं सुखम् ॥ १२९ ॥ १ प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति और उत्साहशक्ति.

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