हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें१३४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १२४- ढूंढ खखोल करने वाले राजाके पुरुषोंने उस वृक्षके बिलमें काले सांपको देखा और मार डाला. इसलिये मैं कहता हूं-“उपायसे जो हो सकता है” इत्यादि-’ करटक बोला-‘जो ऐसा है तो चले जाओ, तुम्हारे मार्ग कल्याणकारी हो ।’ पीछे दमनक पिंगलकके पास जा कर प्रणाम करके बोला-‘महाराज ! नाशकारी और बड़े भयके करने वाले किसी कामको जान कर आया हूं. यतः,— आपद्युन्मार्गमने कार्यकालात्ययेषु च । कल्याणवचनं ब्रूयादपृष्टोऽपि हितो नरः ॥ १२४ ॥ क्योंकि—आपत्तिमें, कुमार्गसे जाने पर, कामका समय बीतनेमें हितकारी मनुष्यको बिना पूछेभी कल्याणकारी बात कह देना चाहिये ॥ १२४ ॥ अन्यच्च,— भोगस्य भाजनं राजा, न राजा कार्यभाजनम् । राजकार्यपरिध्वंसी मन्त्री दोषेण लिप्यते ॥ १२५ ॥ और दूसरे-राजा भोगका पात्र है अर्थात् सुख भोगनेके लिये है, कुछ काम करनेके लिये नहीं है, राजाके कार्यको नाश करने ( बिगाडने ) वाला मंत्रीही दोषभागी होता है ॥ १२५ ॥ तथा हि पश्य । अमात्यानामेष क्रमः,— और देखो, मंत्रियोंकी यह रीति है,— वरं प्राणपरित्यागः शिरसो वापि कर्तनम् । न तु स्वामिपदावाप्तिपातकेच्छोरुपेक्षणम्’ ॥ १२६ ॥ प्राणका त्याग और शिरका कट जानाभी अच्छा है परन्तु राजाको राज्य- हरणरूपी पातक करने वालेको दंड न देना अच्छा नहीं है ॥ १२६ ॥ पिङ्गलकः सादरमाह—‘अथ भवान् किं वक्तुमिच्छति ?’। दम- नको ब्रूते—‘देव ! संजीवकस्त्वोपर्यसदृशव्यवहारीव लक्ष्यते । तथा चास्मत्संनिधाने श्रीमद्देवपादानां शक्तित्रयनिन्दां कृत्वा राज्यमेवाभिलषति ।’ एतच्छ्रुत्वा पिङ्गलकः सभयं साश्चर्यं मत्वा तूष्णीं स्थितः । दमनकः पुनराह—‘देव ! सर्वामात्यपरित्यागं कृत्वैक एवायं यत्त्वया सर्वाधिकारी कृतः स एव दोषः ।