हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 163, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-१५२] भगवान्की आज्ञासे समुद्रने टिटहरेको अंडे सौंपना १४३ मन्दं मन्दमुपसर्पन् विस्मितमिवात्मानमदर्शयत् । संजीवकेन सादरमुक्तम्—'भद्र ! कुशलं ते ?' । दमनको ब्रूते—'अनुजीविनां कुतः कुशलम् ? फिर कष्टसे स्वामीके कहनेसे उस टिटहरीने वहाँही अंडे धरे । यह सब सुन कर समुद्रभी उसकी सामर्थ्य टटोलनेके लिये उसके अंडे बहा ले गया. तब टिटहरी शोकसे खिन्न हो कर पतिसे कहने लगी-'हे स्वामी ! बड़ा कष्ट आ पड़ा, वे मेरे अंडे नष्ट हो गये।' टिटहरा बोला-'प्यारी ! डर मत।' ऐसा कह कर और सब पक्षियोंको साथ ले कर वह पक्षियोंके स्वामी गरुड़जीके पास गया । वहाँ जा कर टिटहरेने सब समाचार भगवान् गरुड़जीके सामने निवेदन कर दिया कि—'हे महाराज ! समुद्रने मुझ अपने घर बैठे हुएको बिना अपराधही सताया है।' तब उसकी बात सुन कर गरुड़जीने सृष्टि, स्थिति और प्रलयके कारण प्रभु भगवान् नारायणको जता दिया । उन्होंने समुद्रको अंडे देनेकी आज्ञा दे दी । तब भगवान्की आज्ञाको सिर पर रख कर समुद्रने उन अंडोंको टिटहरेको सौंप दिया। इसलिये मैं कहता हूं-"शरीर और शरीरधारीके कामको बिना जाने" इत्यादि।' राजा बोला-'यह कैसे जाना जाय कि वह द्रोह करने लगा है ?' दमनकने कहा— 'जब वह घमंडसे सींगोंकी नोंकको मारनेके लिये सामने करता हुआ निडर-सा आवे तब स्वामी आपही जान जायेंगे।' इस प्रकार कह कर संजीवकके पास गया और वहाँ जा कर धीरे धीरे पास खिसकता खिसकता अपनेको मन मलीन-सा दिखाया । संजीवकने आदरसे कहा-'मित्र ! कुशल तो है ?' दमनकने कहा-'सेवकोंको कुशल कहाँ ? यतः,— संपत्तयः पराधीनाः सदा चित्तमनिर्वृतम् । स्वजीवितेऽप्यविश्वासस्तेषां ये राजसेवकाः ॥ १५२ ॥ क्योंकि,—जो राजाके सेवक हैं उनकी संपत्तियाँ पराधीन, मन सदा दुःखी और तो क्या युद्ध इत्यादिकी शंकासे वे अपने जीनेकाभी भरोसा नहीं रखते हैं ॥ १५२ ॥ अन्यच्च,— कोऽर्थान्प्राप्य न गर्वितो विषयिणः, कस्यापदोऽस्तं गताः ? स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः, को वाऽस्ति राज्ञां प्रियः ? ।