भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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१४४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १५३- कः कालस्य भुजान्तरं न च गतः, कोऽर्थी गतो गौरवं ? को वा दुर्जनवागुरासु पतितः क्षेमेण यातः पुमान् ? ॥ १५३ ॥ और दूसरे— कौनसा मनुष्य धनको पा कर अहंकारी नहीं होता है ? किस कामीको आपत्तियाँ नहीं घेरती हैं ? स्त्रियोंने किसका मन नहीं डिगाया ? राजाओंका कौन प्यारा है ? कौनसा मनुष्य कालकी भुजाओंके बीचमें नहीं गया ? कौनसे याचकका सन्मान हुआ है ? और कौनसा पुरुष दुर्जनोंके कपटमें पड़ कर सकुशल आया है ? ॥ १५३ ॥ संजीवकनेोक्तम्—'सखे ! ब्रूहि किमेतत् ?'। दमनक आह-'किं ब्रवीमि मन्दभाग्यः ? संजीवकने कहा—'मित्र ! कहो तो यह क्या बात है ?' दमनकने कहा— 'मैं मंदभागी क्या कहूँ ? पश्य,— मज्जन्नपि पयोराशौ लब्ध्वा सर्पावलम्बनम् । न मुञ्चति न चादत्ते तथा मुग्धोऽस्मि संप्रति ॥ १५४ ॥ देखो,—जैसे समुद्रमें डूबता हुआ भी मनुष्य सर्पका सहारा पा कर न तो छोड़ सकता है न पकड़ सकता है वैसाही इस समय मैं मूढ़ हूँ, याने कुछ समझ नहीं सकता हूँ कि क्या करूँ ॥ १५४ ॥ यतः,— एकत्र राजविश्वासो नश्यत्यन्यत्र बान्धवः । किं करोमि क्व गच्छामि पतितो दुःखसागरे' ॥ १५५ ॥ क्योंकि एक तरफ राजाका विश्वास और दूसरी तरफ बान्धवका विनाश होना क्या करूँ, कहाँ जाऊँ ? इस दुःखसागरमें पड़ा हूँ ॥ १५५ ॥ इत्युक्त्वा दीर्घं निःश्वस्योपविष्टः । संजीवको ब्रूते-'मित्र ! तथापि सविस्तरं मनोगतमुच्यताम् ।' दमनकः सुनिभृतमाह— 'यद्यपि राजविश्वासो न कथनीयस्तथापि भवानस्मदीय- प्रत्ययादागतः । मया परलोकार्थिनावश्यं तव हितमाख्येयम् । शृणु । अयं स्वामी तवोपरि विकृतबुद्धी रहस्युक्तवान्—'संजीव- कमेव हत्वा स्वपरिवारं तर्पयामि ।' एतच्छ्रुत्वा संजीवकः परं विषादमगमत् । दमनकः पुनराह—'अलं विषादेन । प्राप्तकाल-