भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 165

-१५८] कृपण, राजा, मेघ और स्त्रीका स्वभाववर्णन १४५ कार्यमनुष्ठीयताम् ।' संजीवकः क्षणं विमृश्याह स्वगतम्— 'सुष्ठु खल्विदमुच्यते । किं वा दुर्जनचेष्टितं न वेत्येतद्व्यवहारा- न्निर्णैतुं न शक्यते । यह कह कर लंबी साँस भर कर बैठ गया । तब संजीवकने कहा-‘मित्र ! तोभी सब विस्तारपूर्वक मनकी बात कहो । दमनकने बहुत छिपाते २ कहा-‘यद्यपि राजाका गुप्त विचार नहीं कहना चाहिये तोभी तुम मेरे भरोसेसे आये हो ।-अत एव मुझे परलोककी अभिलाषाके डरसे अवश्य तुम्हारे हितकी बात कहनी चाहिये । सुनो, तुम्हारे ऊपर क्रोधित इस स्वामीने एकांतमें कहा है कि संजीवकको मार कर अपने परिवारको दूँगा ।’ यह सुनतेही संजीवकको बड़ा विषाद हुआ । फिर दमनक बोला-‘विषाद मत करो, अवसरके अनुसार काम करो.’ संजीवक छिन भर चित्तमें विचार कर कहने लगा-‘निश्चय यह ठीक कहता है; अथवा दुर्जनका यह काम है अथवा नहीं है, यह व्यवहारसे निर्णय नहीं हो सकता है. यतः,— दुर्जनगम्या नार्यः प्रायेणापात्रभृद्भवति राजा । कृपणानुसारि च धनं देवो गिरिजलधिवर्षी च ॥ १५६ ॥ क्योंकि—स्त्रियाँ दुर्जनोंके पास जाती हैं, बहुधा राजा कुपात्रोंका पालन करता है, धन कृपणके पास जाता है और इन्द्र पहाड़ और समुद्रमें बरसाता है ॥१५६॥ कश्चिदाश्रयसौन्दर्याद्धत्ते शोभामसज्जनः । प्रमदालोचनन्यस्तं मलीमसमिवाञ्जनम् ॥ १५७ ॥ कोई २ दुर्जन ( अपना ) आश्रयकी सुन्दरतासे, सुन्दर स्त्रियोंके नेत्रोंमें आँजा हुआ मैला काजलके समान, शोभा पाता है ॥ १५७ ॥ तत्र विचिन्त्योक्तम्—‘कष्टं किमिदमापतितम् ? । उसने विचार कर कहा-‘यह क्या कष्ट आ पड़ा ? । यतः,— आराध्यमानो नृपतिः प्रयत्ना- न्न तोषमायाति किमत्र चित्रम् ? । अयं त्वपूर्वप्रतिमाविशेषो यः सेव्यमानो रिपुतामुपैति ॥ १५८ ॥ हि० १०