भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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१४६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १५९- क्योंकि—राजा बड़े यत्नसे सेवा करने पर भी प्रसन्न नहीं होता है इसमें क्या आश्चर्य है ? क्योंकि यह एक अनोखीही देवताकी मूर्ति है जो सेवा करने पर भी शत्रुता करती है ॥ १५८ ॥ तदयमशक्यार्थः प्रमेयः । इस लिये इस बातका कुछ भेद नहीं जाना जाता है । पश्य,— निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति । अकारणद्वेषि मनस्तु यस्य वै कथं जनस्तं परितोषयिष्यति ? ॥ १५९ ॥ देखो—जो निश्चय करके किसी कारणसे क्रोध करता है वह उस कारणके नाश हो जाने पर अवश्य प्रसन्न हो जाता है, पर जिसका मन बिना कारणके वैर करने लगा है उसको मनुष्य कैसे प्रसन्न कर सकता है ? ॥ १५९ ॥ किं मयापकृतं राज्ञः ? अथवा निर्निमित्तापकारिणश्च भवन्ति राजानः ।' दमनको ब्रूते—'एवमेतत्, शृणु— और मैंने राजाका क्या अपकार किया? अथवा, राजा लोग विनाही कारण अपकार करने वाले होते हैं?' । दमनक बोला—'यह योंही है । सुनो,— विज्ञैः स्निग्धैरुपकृतमपि द्वेष्यतामेति कश्चित् साक्षादन्यैरपकृतमपि प्रीतिमेवोपयाति । चित्रं चित्रं किमथ चरितं नैकभावाश्रयाणां सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ॥ १६० ॥ कोई कोई मनुष्य पण्डितोंसे तथा मित्रोंसे उपकार किये जाने पर भी शत्रुता करता है, और शत्रुओंसे प्रत्यक्षमें अपकार किये जाने पर भी प्रसन्न होता है । अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुषोंका चरित्र बड़ा अद्भुत है और सेवाका काम योगियोंसेभी बड़े कष्टसे हो सकता है ॥ १६० ॥ अन्यच्च,— कृतशतमसत्सु नष्टं सुभाषितशतं च नष्टमबुधेषु । वचनशतमवचनकरे बुद्धिशतमचेतने नष्टम् ॥ १६१ ॥