हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें-१६४ ] राजाके परिवार और चन्दनवृक्षका साम्य १४७-
और दूसरे-दुष्टोंके विषयमें सैकड़ों उपकार नष्ट हो जाते हैं, मूर्खोंके सामने सैकड़ों अच्छे २ उपदेश नष्ट हो जाते हैं, हितके वचनको नहीं मानने वालेके सामने सैकड़ों वचन नष्ट हो जाते हैं, और महामूर्खके सामने सैकड़ों बुद्धियाँ नष्ट हो जाती हैं ॥ १६१ ॥ किं च,— चन्दनतरुषु भुजंगा जलेषु कमलानि तत्र च ग्राहाः । गुणघातिनश्च भोगे खला न च सुखान्यविघ्नानि ॥ १६२ ॥ और चन्दनके वृक्षों पर सर्प, जलमें कमल और उसीमें मगर आदि होते हैं, और राजादि अथवा विषयके भोगमें गुणके नाश करने वाले दुर्जन लोग होते हैं; इसीलिये सुख विघ्नरहित नहीं है ॥ १६२ ॥ अन्यच्च,— मूलं भुजंगैः कुसुमानि भृङ्गैः शाखाः प्लवङ्गैः शिखराणि भल्लैः । नास्त्येव तच्चन्दनपादपस्य यन्नाश्रितं दुष्टतरैश्च हिंस्रैः ॥ १६३ ॥ और दूसरे-जड़ सर्पोंसे, पुष्प भँवरोंसे, डालियाँ बन्दरोंसे और चोटी बर्छीके समान पत्तोंसे, इस प्रकार चन्दनके वृक्षका ऐसा कोईसा भाग नहीं है जो दुष्ट जंतुओंसे न घिरा हो ॥ १६३ ॥ अयं तावत्स्वामी वाचि मधुरो विषहृदयो ज्ञातः । मुझे यह स्वामी वाणीमें मीठा और पेटका कपटी समझ पड़ा । यतः,— दूरादुच्छ्रितपाणिराद्र्रनयनः प्रोत्सारितार्धासनो गाढालिङ्गनतत्परः प्रियकथाप्रश्नेषु दत्तादरः । अन्तर्भूतविषो बहिर्मधुमयश्चातीव मायापटुः को नामायमपूर्वनाटकविधिर्यः शिक्षितो दुर्जनैः ? ॥१६४॥ क्योंकि—दूरसे ऊँचे हाथ उठाना, प्रीतिसे रसीले नेत्र करना, आधा आसन बैठनेके लिये देना, अच्छे प्रकारसे मिलना, प्रिय कथाके पूछनेमें आदर करना, भीतर विषयुक्त अर्थात् कपटयुक्त और बाहरसे मीठी २ बातें करना यह जिसमें