भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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१७१ ] संग्राममें मरनेकी प्रशंसा १४९ यतः,— मन्त्रिणा पृथिवीपालचित्तं विघटितं क्वचित् । वलयं स्फटिकस्येव को हि संधातुमीश्वरः ? ॥ १६७ ॥ क्योंकि—किसी काममें मंत्रीसे फटे हुये राजाके चित्तको कांचकी चूड़ीके समान कोन जोड़नेको समर्थ हो सकता है ? अर्थात् वह सर्वथा अशक्य है ॥ अन्यच्च,— वज्रं च राजतेजश्च द्वयमेवातिभीषणम् । एकमेकत्र पतति पतत्यन्यत् समन्ततः ॥ १६८ ॥ और दूसरे, वज्र तथा राजाका तेज ये दोनों बड़े भयंकर हैं, एक अर्थात् वज्र तो एकही स्थानमें गिरता है, और दूसरा अर्थात् राजाका तेज, चारों तरफ फैलता है ॥ १६८ ॥ ततः संग्रामे मृत्युरेव वरम् । इदानीं तदाज्ञानुवर्तनमयुक्तम् । फिर संग्राममें मरनाही अच्छा है । अब उसकी आज्ञा मानना उचित नहीं है; यतः,— मृतः प्राप्नोति वा स्वर्गं शत्रुं हत्वा सुखानि वा । उभावपि हि शूराणां गुणावेतौ सुदुर्लभौ ॥ १६९ ॥ क्योंकि—शूर युद्धमें मर कर स्वर्ग पाता है अथवा जीता बचे तो शत्रुको मार कर सुख पाता है, इसलिये शूरोंके यह दोनोंही गुण बड़ें दुर्लभ हैं ॥ १६९ ॥ युद्धकालश्चायम्,— और यह लड़नेका समय है । यत्रायुद्धे ध्रुवं मृत्युर्युद्धे जीवितसंशयः । तमेव कालं युद्धस्य प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ १७० ॥ जिस समय, बुद्धिके नहीं करनेमें मृत्युका होना निश्चय है, और युद्धमें जीनेका संदेह है, उसी कालको पण्डित लोग युद्धका समय कहते हैं ॥ १७० ॥ यतः,— अयुद्धे हि यदा पश्येन्न किंचिद्धितमात्मनः । युध्यमानस्तदा प्राज्ञो म्रियते रिपुणा सह ॥ १७१ ॥ क्योंकि—जब चतुर मनुष्य विना युद्धसे कुछभी अपना हित न देखता है तब दुश्मनके साथ लड़ कर मर जाता है ॥ १७१ ॥