भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 170

१५० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १७२- जये च लभते लक्ष्मीं मृतेनापि सुराङ्गनाम् । क्षणविध्वंसिनः कायः, का चिन्ता मरणे रणे ?' ॥ १७२ ॥ और विजय होने पर स्वामित्व और मरने पर स्वर्ग मिलता है, और यह काया क्षणभंगुर है फिर संग्राममें मरनेकी क्या चिंता है ?' ॥ १७२ ॥ एतच्चिन्तयित्वा संजीवक आह-'भो मित्र ! कथमसौ मां जिघां- सुर्ज्ञातव्यः ?' । दमनको ब्रूते-'यदासौ पिङ्गलकः समुन्नतलाङ्गुल उन्नतचरणो विवृतास्यस्त्वां पश्यति तदा त्वमेव स्वविक्रमं दर्शयिष्यसि । यह सोच कर संजीवक बोला-'हे मित्र ! वह मुझे मारने वाला कैसे समझ पड़ेगा ?' तब दमनकने कहा-'जब यह पिंगलक पूंछ फटकार कर ऊंचे पंजे करके और मुख फाड़ कर देखे तब तुमभी अपना पराक्रम दिखलाना; यतः,- बलवानपि निस्तेजाः कस्य नाभिभवास्पदम् ? । निःशङ्कं दीयते लोकैः पश्य भस्मचये पदम् ॥ १७३ ॥ क्योंकि-तेजहीन बलवान्‌को कौनसा मनुष्य पराजय नहीं कर सकता है? अर्थात् सब कर सकते हैं। देखो, मनुष्य तेज(वह्नि)हीन राखके ढेरमें निडर हो कर पैर रखते हैं ॥ १७३ ॥ किंतु सर्वमेतत्सुगुप्तमनुष्ठातव्यम् । नो चेन्न त्वं नाहम्' इत्युक्त्वा दमनकः करटकसमीपं गतः । करटकेनोक्तम्-'किं निष्पन्नम् ?' दमनकेनोक्तम्-'निष्पन्नोऽसावन्योन्यभेदः ।' करटको ब्रूते- 'कोऽत्र संदेहः ? परन्तु यह सब बात गुप्त ही रखने योग्य है । नहीं तो न तुम और न मैं' यह कह कर दमनक करटकके पास गया। तब करटकने पूछा-'क्या हुआ ?' दमनकने कहा-'दोनोंके आपसमें फूट फैल गई ।' करटक बोला-'इसमें क्या संदेह है ? यतः,- बन्धुः को नाम दुष्टानां कुप्यते को न याचितः । को न दृप्यति वित्तेन कुकृत्ये को न पण्डितः ? ॥ १७४ ॥ क्योंकि-दुष्टोंका कोन बन्धु है ? माँगनेसे कोन नहीं क्रोधित होता है ? धन (पाने) से कौनसा मनुष्य घमंड नहीं करता है ? और बुरा काम करनेमें कोनसा मनुष्य चतुर नहीं है ? ॥ १७४ ॥