भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

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-१७६] धूर्त मनुष्यकी निंदा १५१ अन्यच्च,― दुर्बृत्तः क्रियते धूर्तैः श्रीमानात्मविवृद्धये । किं नाम खलसंसर्गः कुरुते नाश्रयाशवत् ?' ॥ १७५ ॥ और दूसरे-धूर्त मनुष्य अपनी बढ़तीके लिये धनवान्‌को दुराचारी कर देते हैं, इसलिये दुष्टोंका सहवास अग्निके समान क्या क्या नहीं करता है ? याने वह सब अनर्थोंकी जड़ है' ॥ १७५ ॥ ततो दमनकः पिङ्गलकसमीपं गत्वा 'देव ! समागतोऽसौ पापा- शयः । ततः सज्जीभूय स्थीयताम्' इत्युक्त्वा पूर्वोक्ताकारं कार- यामास । संजीवकॊऽप्यागत्य तथाविधं विकृताकारं सिंहं दृष्ट्वा स्वानुरूपं विक्रमं चकार । ततस्तयोर्युद्धे संजीवकः सिंहेन व्यापादितः । तब दमनकने पिंगलकके पास जा कर—'महाराज ! वह पापी आ पहुँचा है, इसलिये सम्हाल कर बैठ जाइये'—यह कह कर पहले जताए हुए आकारको करा दिया. संजीवकने भी आ कर वैसेही बदली हुई चेष्टा वाले सिंहको देख कर अपने योग्य पराक्रम किया । फिर उन दोनोंकी लड़ाईमें संजीवकको सिंहने मार डाला । अथ संजीवकं सेवकं पिङ्गलको व्यापाद्य विश्रान्तः सशोक इव तिष्ठति । ब्रूते च—'किं मया दारुणं कर्म कृतम् ? पीछे सिंह, संजीवक सेवकको मार कर थका हुआ और शोकका-सा मारा बैठ गया । और बोला—'कैसा मैंने दुष्ट कर्म किया है ? यतः,― परैः संभुज्यते राज्यं स्वयं पापस्य भाजनम् । धर्मातिक्रमतो राजा सिंहो हस्तिवधादिव ॥ १७६ ॥ क्योंकि—राजा, हाथीके मारनेसे सिंहके समान धर्मका उल्लंघन करनेसे आप केवल पापका भागी बनता है और राज्यका सुख तो दूसरेही भोगते हैं ॥ १७६ ॥