हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
-१७६] धूर्त मनुष्यकी निंदा १५१ अन्यच्च,― दुर्बृत्तः क्रियते धूर्तैः श्रीमानात्मविवृद्धये । किं नाम खलसंसर्गः कुरुते नाश्रयाशवत् ?' ॥ १७५ ॥ और दूसरे-धूर्त मनुष्य अपनी बढ़तीके लिये धनवान्को दुराचारी कर देते हैं, इसलिये दुष्टोंका सहवास अग्निके समान क्या क्या नहीं करता है ? याने वह सब अनर्थोंकी जड़ है' ॥ १७५ ॥ ततो दमनकः पिङ्गलकसमीपं गत्वा 'देव ! समागतोऽसौ पापा- शयः । ततः सज्जीभूय स्थीयताम्' इत्युक्त्वा पूर्वोक्ताकारं कार- यामास । संजीवकॊऽप्यागत्य तथाविधं विकृताकारं सिंहं दृष्ट्वा स्वानुरूपं विक्रमं चकार । ततस्तयोर्युद्धे संजीवकः सिंहेन व्यापादितः । तब दमनकने पिंगलकके पास जा कर—'महाराज ! वह पापी आ पहुँचा है, इसलिये सम्हाल कर बैठ जाइये'—यह कह कर पहले जताए हुए आकारको करा दिया. संजीवकने भी आ कर वैसेही बदली हुई चेष्टा वाले सिंहको देख कर अपने योग्य पराक्रम किया । फिर उन दोनोंकी लड़ाईमें संजीवकको सिंहने मार डाला । अथ संजीवकं सेवकं पिङ्गलको व्यापाद्य विश्रान्तः सशोक इव तिष्ठति । ब्रूते च—'किं मया दारुणं कर्म कृतम् ? पीछे सिंह, संजीवक सेवकको मार कर थका हुआ और शोकका-सा मारा बैठ गया । और बोला—'कैसा मैंने दुष्ट कर्म किया है ? यतः,― परैः संभुज्यते राज्यं स्वयं पापस्य भाजनम् । धर्मातिक्रमतो राजा सिंहो हस्तिवधादिव ॥ १७६ ॥ क्योंकि—राजा, हाथीके मारनेसे सिंहके समान धर्मका उल्लंघन करनेसे आप केवल पापका भागी बनता है और राज्यका सुख तो दूसरेही भोगते हैं ॥ १७६ ॥
१५२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १७७- अपरं च,— भूम्येकदेशस्य गुणान्वितस्य भृत्यस्य वा बुद्धिमवतः प्रणाशः । भृत्यप्रणाशो मरणं नृपाणां नष्टापि भूमिः सुलभा, न भृत्याः' ॥ १७७ ॥ और दूसरे—राज्यके एक टुकड़ेका और बुद्धिमान् तथा गुणवान् सेवकका इन दोनोंके नाशसे भी राजाओंको सेवकका नाश मरणके समान है, क्योंकि भूमि नष्ट हुईभी सहजमें मिल सकती है परन्तु सेवक नहीं मिल सकते हैं' ॥ १७७ ॥ दमनको ब्रूते—'स्वामिन् ! कोऽयं नूतनो न्यायो यदरातिं हत्वा संतापः क्रियते ? दमनक बोला—'स्वामी ! यह कोनसा नया न्याय है कि शत्रुको मार कर पछ- तावा करते हो ? तथा चोक्तम्,— पिता वा यदि वा भ्राता पुत्रो वा यदि वा सुहृत् । प्राणच्छेदकरा राज्ञा हन्तव्या भूतिमिच्छता ॥ १७८ ॥ जैसा कहा है—संपत्तिको चाहने वाले राजाको प्राणका नाश करने वाला पिता हो, या भाई हो, पुत्र हो, अथवा मित्र हो, मार देना चाहिये ॥ १७८ ॥ अपि च,— धर्मार्थकामतत्त्वज्ञो नैकान्तकरुणो भवेत् । न हि हस्तस्थमप्यन्नं क्षमावान् भक्षितुं क्षमः ॥ १७९ ॥ और भी—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इनके सारको जानने वाले पुरुषको अत्यंत दयालु नहीं होना चाहिये; क्योंकि क्षमाशील पुरुष हाथ पर रक्खे हुए भी भोजनको नहीं खा सकता है ॥ १७९ ॥ किं च,— क्षमा शत्रौ च मित्रे च यतीनामेव भूषणम् । अपराधिषु सत्त्वेषु नृपाणां सैव दूषणम् ॥ १८० ॥ और—शत्रु तथा मित्र पर क्षमा करना केवल तपस्वियोंका ही भूषण है, और राजाओंका अपराध करने वाले प्राणियों पर क्षमा करना तो दूषणही है ॥१८०॥
-१८३ ] दयालु राजा और लोभी ब्राह्मणकी निंदा १५३ अपरं च,— राज्यलोभादहंकारादिच्छतः स्वामिनः पदम् । प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं जीवोत्सर्गो न चापरम् ॥ १८१ ॥ और दूसरे-राज्यके लोभसे अथवा अहंकारसे स्वामीके पदको चाहने वाले सेवकका, उस पापको नाश करनेमें प्राणोंका त्यागही एक प्रायश्चित्त है, और दूसरा कोई नहीं है ॥ १८१ ॥ अन्यच्च,— राजा घृणी ब्राह्मणः सर्वभक्षः स्त्री चावशा दुष्प्रकृतिः सहायः । प्रेष्यः प्रतीपोऽधिकृतः प्रमादी त्याज्या इमे यश्च कृतं न वेत्ति ॥ १८२ ॥ और अत्यन्त दयालु राजा, सर्वभक्षी अर्थात् अत्यंत लोभी ब्राह्मण, अवश स्त्री, बुरी प्रकृति वाला सहायक, उत्तर देने वाला नोकर, असावधान अधिकारी, और पराये उपकारको नहीं मानने वाला—ये त्यागनेके योग्य हैं ॥ १८२ ॥ विशेषतश्च,— सत्यानृता सपरुषा प्रियवादिनी च हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या । नित्यव्यया प्रचुररत्नधनागमा च वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा' ॥ १८३ ॥ और विशेष करके-राजाकी नीति, कभी सच्ची, कभी झूठी, कभी कड़ी, कभी नरम, कभी हिंसा करने वाली, कभी दयालु, कभी धन लेने वाली, कभी उदार, कभी सदा व्यय करने वाली, कभी अनेक रत्न और धनको इकठ्ठा करने वाली, वेश्याके समान बहुत प्रकारकी है' ॥ १८३ ॥ इति दमनकेन संतोषितः पिङ्गलकः स्वां प्रकृतिमापन्नः सिंहासने समुपविष्टः । दमनकः प्रहृष्टमनाः 'विजयतां महाराजः, शुभमस्तु सर्वजगताम्' इत्युक्त्वा यथासुखमवस्थितः । इस प्रकार जब दमनकने संतोष दिलाया तब पिंगलकका जीमें जी आया और सिंहासन पर बैठा । दमनक प्रसन्न चित्त हो कर "जय हो महाराजकी, सब संसारका कल्याण हो" यह कह कर आनन्दसे रहने लगा ।
१५४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १८४- विष्णुशर्मोवाच—'सुहृद्द्वेदः श्रुतस्तावद्भवद्भिः ।' राजपुत्रा ऊचुः—'भवत्प्रसादाच्छ्रुतः। सुखिनो भूता वयम् ।' विष्णुशर्मा बोले—'आपने सुहृद्भेद सुन लिया ?' राजकुमार बोले—'आपकी कृपासे सुना और हम बहुत सुखी हुए ।' विष्णुशर्माऽब्रवीत्—'अपरमपीदमस्तु— सुहृद्भेदस्तावद्भवतु भवतां शत्रुनिलये खलः कालाकृष्टः प्रलयमुपसर्पत्वहरहः । जनो नित्यं भूयात् सकलसुखसंपत्तिवसतिः कथारामे रम्ये सततमिह बालोऽपि रमताम्' ॥ १८४ ॥ इति हितोपदेशे सुहृद्भेदो नाम द्वितीयः कथासंग्रहः समाप्तः । विष्णुशर्मा बोले—'यह और भी हो—आपके शत्रुओंके घरमें मित्रोंमें फूट हो, दुष्ट जन कालके वशमें पड़ कर प्रतिदिन नष्ट हो, प्रजा आपके राज्यमें सदा सब सुख और संपत्तिकी खान हो, और इस रमणीय, हितोपदेशके नीतिकथा रूपी उपवनमें बालक हमेशा रमण करें' ॥ १८४ ॥ पं० रामेश्वरभट्टका किया हुआ हितोपदेश ग्रंथके सुहृद्भेद नामक दूसरे भागका भाषा अनुवाद समाप्त हुआ. शुभम्.
पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रा ऊचुः—‘आर्य ! राजपुत्रा
हितोपदेशः विग्रहः पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रा ऊचुः—‘आर्य ! राजपुत्रा वयम् । तद्विग्रहं श्रोतुं नः कुतूहलमस्ति ।’ विष्णुशर्मणोक्तम्— ‘यदेव भवद्भ्यो रोचते कथयामि । विग्रहः श्रूयतां यस्यायमाद्यः श्लोकः— फिर कथाके आरंभके समय राजपुत्रोंने कहा—‘गुरुजी ! हम राजकुमार हैं। इसलिये विग्रह सुननेकी इच्छा है।’ विष्णुशर्माने कहा—‘जो आपको अच्छा लगे वही कहता हूं । विग्रह सुनिये कि जिसका पहला वाक्य यह है— हंसैः सह मयूराणां विग्रहे तुल्यविक्रमे । विश्वास्य वञ्चिता हंसाः काकैः स्थित्वाऽरिमन्दिरे’ ॥ १ ॥ हंसोंके साथ मोरोंके तुल्य पराक्रमके युद्धमें कौओंने शत्रुके गढ़में रह कर और विश्वास उपजा कर हंसोंको ठगा’ ॥ १ ॥ राजपुत्रा ऊचुः—‘कथमेतत् ?’ । विष्णुशर्मा कथयति— राजपुत्र बोले—‘यह कहानी कैसे है ?’ विष्णुशर्मा कहने लगे— कथा १ [ राजहंस, मोर और उनके मन्त्री आदिकी कहानी १ ] अस्ति कर्पूरद्वीपे पद्मकेलिनामधेयं सरः । तत्र हिरण्यगर्भो नाम राजहंसः प्रतिवसति । स च सर्वैर्जलचरपक्षिभिर्मिलित्वा पक्षिराज्येऽभिषिक्तः । कर्पूरद्वीपमें पद्मकेलि नाम एक सरोवर है, वहाँ हिरण्यगर्भ नाम एक राजहंस रहता था और सब जलचारी पक्षियोंने मिल कर उसे पक्षियोंके राज्य पर राज- तिलक किया था । यतः,— यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजा । अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥ २ ॥
१५६ हितोपदेशः [ विग्रहः ३- क्योंकि—जो संसारमें अच्छा प्रजापालक राजा न हो तो प्रजा, समुद्रमें कर्णधार (खेवटिये) से रहित नावके समान डूब जाती है ॥ २ ॥ अपरं च,— प्रजां संरक्षति नृपः सा वर्धयति पार्थिवम् । वर्धनाद्रक्षणं श्रेयस्तद्भावे सदप्यसत् ॥ ३ ॥ और दूसरे-राजा प्रजाकी रक्षा करता है और वह (प्रजा) कर आदि दे कर राजाको बढ़ाती है, बढ़ानेसे रक्षा कल्याणकारी है, और रक्षाके बिना सचमुच होनाभी नहीं होनेके समान है ॥ ३ ॥ एकदाऽसौ राजहंसः सुविस्तीर्णकमलपर्यङ्के सुखासीनः परि- वारपरिवृतस्तिष्ठति । ततः कुतश्चिद्देशादागत्य दीर्घमुखो नाम बकः प्रणम्योपविष्टः । राजोवाच-‘दीर्घमुख ! देशान्तरादागतो- ऽसि । वार्तां कथय ।’ स ब्रूते—‘देव ! अस्ति महती वार्ता । तां वक्तुं सत्वरमागतोऽहम् । श्रूयताम्,—अस्ति जम्बुद्वीपे विन्ध्यो नाम गिरिः । तत्र चित्रवर्णो नाम मयूरः पक्षिराजो निवसति । तस्यानुचरैश्चरद्भिः पक्षिभिरहं दग्धारण्यमध्ये चरन्नवलोकितः पृष्टश्च—‘कस्त्वम् ? कुतः समागतोऽसि ?’ तदा मयोक्तम्— ‘कर्पूरद्वीपस्य राजचक्रवर्तिनो हिरण्यगर्भस्य राजहंसस्यानुचरो- ऽहम् । कौतुकाद्देशान्तरं द्रष्टुमागतोऽस्मि ।’ एतच्छ्रुत्वा पक्षिभि- रुक्तम्-‘अनयोर्द्देशयोः को देशो भद्रतरो राजा च ?’ । मयोक्तम्— ‘आः ! किमेवमुच्यते ? महदन्तरम् । यतः कर्पूरद्वीपः स्वर्ग एव, राजहंसश्च द्वितीयः स्वर्गपतिः । अत्र मरुस्थले पतिता यूयं किं कुरुथ ? अस्मद्देशे गम्यताम् ।’ ततोऽस्मद्वचनमाकर्ण्य सर्वे सकोपा बभूवुः । एक दिन वह राजहंस सुन्दर बिछे हुए कमलके आसन पर सुखसे बैठा हुआ था और चारों तरफ उसका परिवार बैठा था । इसके बाद किसी देशसे आकर दीर्घमुख नाम बगुला प्रणाम करके बैठ गया । राजा बोला-‘हे दीर्घमुख ! तू कोनसे प्रदेशसे आया है ? समाचार सुना ।’ वह बोला-‘महाराज ! एक बड़ी बात है । उसके सुनानेके लिये तुरंत मैं आया हूँ । सुनिये-जंबूद्वीपमें विंध्य नाम पहाड़ है । वहाँ चित्रवर्ण नाम मोर-पक्षियोंका राजा रहता है । उसके चुगते हुए
अनुचर पक्षियोंने मुझे दग्ध नाम वनमें चुगते देखा, और पूछा—'तू कौन है ? कहाँसे आया है ?' तब मैंने कहा—'कर्पूरद्वीपके चक्रवर्ती राजा हिरण्यगर्भ राज- हंसका मैं अनुचर हूँ । अभिलाषासे नये देश देखनेको आया हूँ ।' यह सुन कर पक्षियोंने कहा—'इन दोनों देशोंमेंसे कोनसा देश तथा राजा अच्छा है ?' मैंने कहा—'अजी ! क्यों ऐसे कहते हो ? इन दोनोंमें बड़ा अन्तर है, क्योंकि कर्पूरद्वीप मानों स्वर्गही है, और राजहंस मानों दूसरा इन्द्र है । इस मारवाड़ देशमें पड़े हुए तुम क्या करते हो ? हमारे देशमें चलो ।' तब मेरी बात सुन कर सब क्रोधित हो गये । तथा चोक्तम्,— पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्धनम् । उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये ॥ ४ ॥ जैसा कहा है कि—सांपोंको दूध पिलाना केवल जहरको बढानां है, मूर्खोंको उपदेश करना भी क्रोध बढानेके लिये है, शान्तिके लिये नहीं; अर्थात् सांपको दूध पिलाना जैसा विषको बढाने वाला है वैसाही मूर्खको किया हुआ उपदेश क्रोधको बढाने वाला है; शांति करने वाला नहीं ॥ ४ ॥ अन्यच्च,— विद्वानेवोपदेष्टव्यो नाविद्वांस्तु कदाचन । वानरानुपदिश्याथ स्थानभ्रष्टा ययुः खगाः' ॥ ५ ॥ और दूसरे–बुद्धिमान्कोही उपदेश करना चाहिये, मूर्खको कभी न करे, जैसे पक्षी बन्दरोंको उपदेश करनेसे स्थान छोड़ कर चले गये' ॥ ५ ॥ राजोवाच—'कथमेतत् ?'। दीर्घमुखः कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसे है?' दीर्घमुख कहने लगा— कथा २ [ पक्षी और बंदरोंकी कहानी २ ] 'अस्ति नर्मदातीरे विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र निर्मितनीड- क्रोडे पक्षिणो निवसन्ति सुखेन । अथैकदा वर्षासु नीलपटलैरा- वृते नभस्तले धारासारैर्महती वृष्टिर्बभूव । ततो वानरांश्च तरुतलेऽवस्थिताञ्शीताकुलान् कम्पमानानवलोक्य कृपया पक्षिभिरुक्तम्—'भो भो वानराः ! शृणुत,—
'नर्मदाके तीर पर एक बड़ा सेमरका वृक्ष है । उस पर पक्षी घोंसला बना कर उसके भीतर, सुखसे रहा करते थे । फिर एक दिने बरसातमें नीले नीले बादलों से आकाशमंडलके छा जाने पर बड़ी बड़ी बूँदोंसे मूसलधार मेघ बरसने लगा और फिर वृक्षके नीचे बैठे हुए बन्दरोंको ठंडीके मारे थर थर काँपते हुए देख कर पक्षियोंने दयासे विचार कहा—'अरे भाई बन्दरो ! सुनो,—
अस्माभिर्निर्मिता नीडाश्चञ्चुमात्राहृतैस्तृणैः । हस्तपादादिसंयुक्ता यूयं किमिति सीदथ ?' ॥ ६ ॥
हमने केवल अपनी चोंचोंसे इकट्ठे किये हुए तिनकोंसे घोंसले बनाये हैं, और तुम तो हाथ, पाँव आदिसे युक्त हो कर फिर ऐसा दुःख क्यों भोगते हो ?' ॥
तच्छ्रुत्वा वानरैर्जातामर्षैरालोचितम्—'अहो ! निर्वातनीड- गर्भावस्थिताः सुखिनः पक्षिणोऽस्मान्निन्दन्ति । भवतु तावद्वृष्टे- रुपशमः ।' अनन्तरं शान्ते पानीयवर्षे तैर्वानरैर्वृक्षमारुह्य सर्वे नीडा भग्नास्तेषामण्डानि चाधः पातितानि । अतोऽहं ब्रवीमि— “विद्वानेवोपदेष्टव्यः” इत्यादि ।' राजोवाच-‘ततस्तैः किं कृतम् ?' बकः कथयति—‘ततस्तैः पक्षिभिः कोपादुक्तम्—‘केनासौ राज- हंसो राजा कृतः?' । ततो मयोपजातकोपेनोक्तम्—‘युष्मदीय- मयूरः केन राजा कृतः ?' एतच्छ्रुत्वा ते सर्वे मां हन्तुमुद्यताः । ततो मयापि स्वविक्रमो दर्शितः ।
यह सुन बन्दरोंने झुँझला कर विचारा—‘अरे ! पवनरहित घोंसलोंके भीतर बैठे हुए सुखी पक्षी हमारी निन्दा करते हैं, करने दो । जब तक वर्षा बंद हो बाद जब पानीका बरसना बंद हो गया तब उन बन्दरोंने पेड़ पर चढ़ कर सब घोंसले तोड़ डाले, और उन्होंने अंडे नीचे गिरा दिये, इसलिये मैं कहता हूँ- “बुद्धिमान्कोही उपदेश करना चाहिये” इत्यादि ।' राजा बोला-‘तब उन्होंने क्या किया ?' बगुला कहने लगा-फिर उन पक्षियोंने क्रोधसे कहा-‘किसने इस राज- हंसको राजा बनाया है?' तब मैंने झुँझला कर कहा-‘तुम्हारे मोरको किसने राजा बनाया है?' यह सुन कर वे सब मुझे मारनेको तयार हुए । तब मैंनेभी अपना पराक्रम दिखाया ।
-९ ] पराक्रम और तारतम्यज्ञानकी प्रशंसा १५९ यतः,— 'अन्यदा भूषणं पुंसां क्षमा लज्जेव योषिताम् । पराक्रमः परिभवे वैयात्यं सुरतेष्विव' ॥ ७ ॥ क्योंकि-रतिकालको छोड़ कर स्त्रियोंको लज्जा जैसा अलंकार है वैसाही पराजयसे भिन्न समयमें पुरुष को क्षमा आभूषण है, और पराजयके समय, रतिकालमें स्त्रियोंको निर्लज्जताके समान, पराक्रमही प्रशंसाके योग्य है' ॥ ७ ॥ राजा विहस्याह— 'आत्मनश्च परेषां च यः समीक्ष्य बलाबलम् । अन्तरं नैव जानाति स तिरस्क्रियतेऽरिभिः ॥ ८ ॥ राजा हँस कर बोला—'जो अपनी और शत्रुओंकी निर्बलता और सबलता विचार कर, अंतर नहीं जानता है उसका शत्रु तिरस्कार ( पराजय ) करते हैं; अर्थात् अपना और शत्रूका बलाबल जानना विद्वानको अत्यावश्यक है ॥ ८ ॥ अन्यच्च,— सुचिरं हि चरन्नित्यं क्षेत्रे सस्यमबुद्धिमान् । द्वीपिचर्मपरिच्छन्नो वाग्दोषाद्गर्दभो हतः' ॥ ९ ॥ और दूसरे—जैसे अनाजके खेतमें बहुत दिन तक नित्य नाज चरता हुआ मूर्ख गधा बाघम्बर ओढ़े हुए वाणीके दोषसे अर्थात् रेंकनेसे मारा गया' ॥ ९ ॥ बकः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । राजा कथयति — बगुला पूछने लगा—'यह कथा कैसे है ?' राजा कहने लगा।— कथा ३ [ बाघंबर ओढा हुआ धोबीका गधा और खेतवालेकी कहानी ३ ] 'अस्ति हस्तिनापुरे विलासो नाम रजकः । तस्य गर्दभो- ऽतिवाहनाद्दुर्बलो मुमूर्षुरिवाभवत् । ततस्तेन रजकेनासौ व्याघ्रचर्मणा प्रच्छाद्यारण्यसमीपे सस्यक्षेत्रे नियुक्तः । ततो दूरात्तमवलोक्य व्याघ्रबुद्ध्या क्षेत्रपतयः सत्वरं पलायन्ते । अथैकदा केनापि सस्यरक्षकेण धूसरकम्बलकृततनुत्राणेन धनुः-
[page-header] १६० हितोपदेशः [ विग्रहः ९- [/page-header]
काण्डं सज्जीकृत्यानतकायेनैकान्ते स्थितम् । तं च दूराद्दृष्ट्वा गर्दभः पुष्टाङ्गो यथेष्टसस्यभक्षणजातबलो गर्दभोऽयमिति मत्वोच्चैः शब्दं कुर्वाणस्तदभिमुखं धावितः । सस्यरक्षकेण चीत्कारशब्दा- न्निश्चित्य गर्दभोऽयमिति लीलयैव व्यापादितः । अतोऽहं ब्रवीमि—"सुचिरं हि चरन्नित्यम्" इत्यादि' ॥ दीर्घमुखो ब्रूते— ततः पक्षिभिरुक्तम्—'अरे पाप दुष्ट बक ! अस्माकं भूमौ चरन्नस्माकं स्वामिनमधिक्षिपसि ? तन्न क्षन्तव्यमिदानीम्' इत्युक्त्वा सर्वे मां चक्षुभिर्हत्वा सकोपा ऊचुः—'पश्य रे मूर्ख ! स हंसस्तव राजा सर्वथा मृदुः। तस्य राज्याधिकारो नास्ति । यत एकान्तमृदुः करतलस्थमप्यर्थं रक्षितुमक्षमः स कथं पृथिवीं शास्ति ? राज्यं वा तस्य किम् ? किंतु त्वं च कूपमण्डूकः । तेन तदाश्रयमुपदिशसि ।
‘हस्तिनापुरमें एक विलास नाम धोबी रहता था । उसका गधा अधिक बोझ ढौनेसे दुबला मरासू-सा हो गया था । फिर उस धोबीने इसे बाघकी खाल ओढ़ा कर वनके पास नाजके खेतमें रख दिया । फिर दूरसे उसे देख कर और बाघ समझ, खेत वाले शीघ्र भाग जाते थे । इसके अनन्तर एक दिन कोई खेतका रखवाला धूसर रंगका कंबल ओढ़े हुए धनुष बाण चढ़ा कर शरीरको नौढ़ा कर एकांतमें बैठ गया । उधर मन माना अन्न चरनेसे बलवान्, तथा संड़याया हुआ गधा उसे देख कर और गधा जान कर ढेंचू ढेंचू खरसे रेंकता हुआ उसके सामने दौड़ा । तब खेतवालेने, रेंकनेके शब्दसे इसको गधा निश्चय करके सहजमेंही मार डाला। इसलिये मैं कहता हूँ-“बहुत काल तक चरता हुआ” इत्यादि । दीर्घमुख बोला-फिर पक्षियोंने कहा-‘अरे पापी दुष्ट बगुले ! तू हमारी भूमिमें चुग कर हमारेही स्वामीकी निन्दा करता है ? इसलिये अब क्षमा करनेके योग्य नहीं है ।' यह कह कर सब मुझे चोंचोंसे मार कर क्रोधसे बोले-‘अरे मूर्ख ! देख, वह हंस तेरा राजा सब प्रकारसे भोला है, उसको राज्यका अधिकार नहीं है । क्योंकि निरा भोला हथेली पर धरे हुए धनकीभी रक्षा नहीं कर सकता है । वह कैसे पृथ्वीका राज्य करता है ? अथवा उसका राज्यही क्या है ? वरन तूभी कुएका मैंडक है । इसलिये उसके आश्रयका उपदेश करता है ।
सुन,—फल और छायासे युक्त बड़े वृक्षकी सेवा करनी चाहिये । जो भाग्यसे
-१३ ] महदाश्रयकी प्रशंसा १६१ शृणु,— सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः । यदि दैवात्फलं नास्ति च्छाया केन निवार्यते ? ॥ १० ॥ सुन,—फल और छायासे युक्त बड़े वृक्षकी सेवा करनी चाहिये । जो भाग्यसे फल ( प्राप्य ) नहीं है तो छायाको कौन भला दूर कर सकता है ? ॥ १० ॥ अन्यच्च,— हीनसेवा न कर्तव्या कर्तव्यो महदाश्रयः । पयोऽपि शौण्डिकीहस्ते वारुणीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥ और दूसरे—नीचकी सेवा नहीं करनी चाहिये, बडे पुरुषोंका आश्रय करना चाहिये, जैसे कलारिनके हाथमें दूधकोभी लोग वारुणी ( शराब ) समझते हैं ११ अन्यच्च,— महानप्यल्पतां याति निर्गुणे गुणविस्तरः । आधाराधेयभावेन गजेन्द्र इव दर्पणे ॥ १२ ॥ और गुणहीनमें बड़ा गुणका कहना भी लघुताको प्राप्त होता है, जैसे आधार और आधेयभावसे दर्पणमें हाथीका प्रतिबिंब छोटा दीखता है ॥ १२ ॥ विशेषतश्च,— व्यपदेशेऽपि सिद्धिः स्यादतिशक्ते नराधिपे । शशिनो व्यपदेशेन शशकाः सुखमासते' ॥ १३ ॥ और विशेष करके राजाके सबल होने पर उसके छल(बहाने)सेभी कार्य सिद्ध हो जाता है । जैसे चन्द्रमाके छल(बहाने)से खरगोश सुखसे रहने लगे' ॥ १३ ॥ मयोक्तम्—'कथमेतत् ?' । पक्षिणः कथयन्ति— मैंने कहा-'यह कथा कैसी है ?' पक्षी कहने लगे ।— कथा ४ [ हाथियोंका झुंड और बूढे शशककी कहानी ४ ] 'कदाचिदपि वर्षासु वृष्टेरभावात्तृषार्तो गजयूथो यूथपति- माह—'नाथ ! कोऽभ्युपायोऽस्माकं जीवनाय ? नास्ति क्षुद्रजन्तूनां १ जिसमें वस्तु रक्खी जाय. २ वस्तु. हि० ११
१६२ हितोपदेशः [ विग्रहः १४- निमज्जनस्थानम् । वयं च निमज्जनस्थानाभावान्मृतार्हा इव । किं कुर्मः ? क्व यामः ?' । ततो हस्तिराजो नातिदूरं गत्वा निर्मलं ह्रदं दर्शितवान् । ततो दिनेषु गच्छत्सु तत्तीरावस्थिता गजपादाहतिभिश्चूर्णिताः क्षुद्रशशकाः ।' अनन्तरं शिलीमुखो नाम शशकश्चिन्तयामास—'अनेन गजयूथेन पिपासाकुलितेन प्रत्यहमत्रागन्तव्यम् । अतो विनश्यत्यस्मत्कुलम् ।' ततो विजयो नाम वृद्धशशकोऽवदत्—'मा विषीदत । मयात्र प्रतीकारः कर्तव्यः ।' ततोऽसौ प्रतिज्ञाय चलितः । गच्छता च तेनालोचि- तम्—'कथं गजयूथसमीपे स्थित्वा वक्तव्यम् ? किसी समय वर्षाके मोसममें वर्षा न होनेसे प्यासके मारे हाथियोंका झुंड अपने स्वामीसे कहने लगा—'हे स्वामी ! हमारे जीनेके लिये अब कौनसा उपाय है ? छोटे छोटे जन्तुओंको नहानेके लिये भी स्थान नहीं है । और हम तो स्नानके लिये स्थान न होनेसे मरेके समान हैं । क्या करें ? कहाँ जायँ ?' हाथियोंके राजाने समीपही जो एक निर्मल सरोवर था वहां जा कर दिखा दिया । फिर कुछ दिन बाद उस सरोवरके तीर पर रहने वाले छोटे छोटे शशक हाथियोंके पैरोंकी रेलपेलसे खुँद गये । पीछे शिलीमुख नाम शशक सोचने लगा—'प्यासके मारे यह हाथियोंका झुंड, यहाँ नित्य आवेगा, इसलिये हमारा कुल तो नष्ट हो जायगा'. फिर विजय नाम एक बूढ़े शशकने कहा—'खेद मत करो। मैं इसका उपाय करूँगा । फिर वह प्रतिज्ञा करके चला गया । और चलते चलते इसने सोचा—'कैसे हाथियोंके झुंडके पास खड़े हो कर बात चीत करनी चाहिये ? यतः,— स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नपि भुजंगमः । पालयन्नपि भूपालः प्रहसन्नपि दुर्जनः ॥ १४ ॥ क्योंकि—हाथी ( स्पर्शसेभी ) छूताही, साँप सूंघताही, राजा रक्षा करता हुआभी, और दुर्जन हँसता हुआभी मार डालता है ॥ १४ ॥ अतोऽहं पर्वतशिखरमारुह्य यूथनाथं संवादयामि ।' तथाऽनुष्ठिते यूथनाथ उवाच—'कस्त्वम् ?, कुतः समायातः ?' । स ब्रूते— 'शशकोऽहम् । भगवता चन्द्रेण भवदन्तिकं प्रेषितः ।' यूथपति- राह—'कार्यमुच्यताम् ।'
-१५] दूतकी सत्यप्रियता १६३ इसलिये मैं पहाड़ की चोटी पर बैठ कर झुंडके स्वामीसे अच्छी प्रकारसे बोलूँ ।' ऐसा करने पर झुंडका स्वामी बोला—'तू कौन है ? कहाँसे आया है ?' वह बोला—'मैं शशक हूँ । भगवान् चन्द्रमाने आपके पास भेजा है ।' झुंडके स्वामीने कहा—'क्या काम है बोल ।' विजयो ब्रूते— 'उद्यतेष्वपि शस्त्रेषु दूतो वदति नान्यथा । सदैवांवध्यभावेन यथार्थस्य हि वाचकः ॥ १५ ॥ विजय बोला—'मारनेके लिये शस्त्र उठाने पर भी दूत अनुचित नहीं करता है, क्योंकि सब कालमें नहीं मारे जानेसे ( मृत्युकी भीति न होनेसे ) वह निश्चय करके सच्ची ही बात बोलने वाला होता है ॥ १५ ॥ तदहं तदाज्ञया ब्रवीमि । शृणु, यदेते चन्द्रसरोरक्षकाः शशका- स्त्वया निःसारितास्तदनुचितं कृतम् । ते शशकाश्चिरमस्माकं रक्षिताः । अत एव मे शशाङ्क इति प्रसिद्धिः ।' एवमुक्तवति दूते यूथपतिर्भयादिदमाह—'प्रणिधेहि । इदमज्ञानतः कृतम् । पुनर्न कर्तव्यम् ।' दूत उवाच—'यद्येवं तदत्र सरसि कोपात्कम्प- मानं भगवन्तं शशाङ्कं प्रणम्य प्रसाद्य गच्छ ।' ततो रात्रौ यूथपतिं नीत्वा जले चञ्चलं चन्द्रबिम्बं दर्शयित्वा यूथपतिः प्रणामं कारितः । उक्तं च तेन—'देव ! अज्ञानादनेनापराधः कृतः, ततः क्षम्यताम् । नैवं वारान्तरं विधास्यते' इत्युक्त्वा प्रस्थापितः । अतोऽहं ब्रवीमि—"व्यपदेशोऽपि सिद्धिः स्यात्” इति । ततो मयोक्तम्—'स एवास्मत्प्रभू राजहंसो महाप्रतापो- ऽतिसमर्थः। त्रैलोक्यस्यापि प्रभुत्वं तत्र युज्यते, किं पुना राज्यम् ?' इति । तदाऽहं तैः पक्षिभिः 'दुष्ट ! कथमस्मद्भू मौ चरसि ?' इत्य- भिधाय राज्ञश्चित्रवर्णस्य समीपं नीतः । ततो राज्ञः पुरो मां, १ 'साधुर्वा यदि वाऽसाधुः परैरेश समर्पितः । ब्रुवन् परार्थं परवान् न दूतो वधमर्हति' ( सुं. का. ५२-२१) भावार्थ यह है कि, दूत पराया ( एवं दूसरेका आज्ञावश ) होनेसे भला-बुरा बोलने पर भी वह सदैव अवध्य है.
१६४ हितोपदेशः [ विग्रहः १६- प्रदर्श्य तैः प्रणम्योक्तम्—'देव ! अवधीयतामेष दुष्टो बको यदस्मद्देशे चरन्नपि देवपादानधिक्षिपति ।' राजाह—'कोऽयम् ? कुतः समायातः ?' । त ऊचुः—'हिरण्यगर्भनाम्नो राजहंसस्यानु- चरः कर्पूरद्वीपादागतः ?' । अथाहं गृध्रेण मन्त्रिणा पृष्टः—'कस्तत्र मुख्यो मन्त्री ?' इति । मयोक्तम्—'सर्वशास्त्रार्थपारगः सर्वज्ञो नाम चक्रवाकः ।' गृध्रो ब्रूते—'युज्यते, स्वदेशजोऽसौ । इसलिये मैं उनकी आज्ञासे कहता हूँ । सुनिये, जो ये चन्द्रमाके सरोवरके रखवाले शशकोंको आपने निकाल दिया है यह अनुचित किया । वे शशक हमारे बहुत दिनसे रक्षित हैं इसीलिये मेरा नाम “शशांक” प्रसिद्ध है । दूतके ऐसा कहतेही हाथियोंका स्वामी भयसे यह बोला-‘सोच लो, यह बात अनजानपन की है । फिर नहीं करूँगा ।' दूतने कहा-‘जो ऐसा है तो इस सरोवरमें क्रोधसे काँपते हुए भगवान् चन्द्रमाजीको प्रणाम कर, और प्रसन्न करके चला जा । फिर रातको झुंडके स्वामीको ले जा कर और जलमें हिलते हुए चन्द्रमाके गोलेको दिखवा कर झुंडके स्वामीसे प्रणाम कराया और इसने कहा-‘हे महाराज ! भूलसे इसने अपराध किया है इसलिये क्षमा कीजिये, फिर दूसरी बार नहीं करेगा', यह कह कर बिदा किया । इसलिये मैं कहता हूँ—“छलसेभी काम सिद्ध हो जाता है ।” फिर मैंने कहा-‘वह हमारा स्वामी राजहंस तो बड़ा प्रतापी और अत्यन्त समर्थ है । तीनों लोककीभी प्रभुता उसके योग्य है, फिर यह राज्य क्या है ? तब वे पक्षी मुझे “हे दुष्ट ! हमारी भूमिमें क्यों बसता है ?” यह कह कर चित्रवर्ण राजाके पास ले गये । फिर राजाके सामने मुझे दिखला कर उन्होंने प्रणाम करके कहा-‘महाराज ! ध्यान दे कर सुनिये । यह दुष्ट बगुला हमारे देशमें बसता हुआभी आपकी निन्दा करता है ।' राजा बोला-‘यह कौन है ? कहाँसे आया है ?' वे कहने लगे-‘हिरण्यगर्भ नाम राजहंसका अनुचर कर्पूरद्वीपसे आया है' । फिर गिद्ध मंत्रीने मुझसे पूछा-‘वहाँ मुख्य मंत्री कौन है ?' मैंने कहा-‘सब शास्त्रोंको पढ़ा हुआ सर्वज्ञ नाम चकवा है ।' गिद्ध बोला- ठीक है । वह स्वदेशी है; यतः,— स्वदेशजं कुलाचारं विशुद्धमुपधाशुचिम् । मन्त्रज्ञमव्यसनिनं व्यभिचारविवर्जितम् ॥ १६ ॥
-१८ ] मन्त्रीका लक्षण, राजा आदिकोका अप्राप्य चाहना १६५ क्योंकि—स्वदेशी, कुलकी रीतिमें निपुण, धर्मशील अर्थात् उत्कोच (रिशबत) आदिको नहीं लेने वाला, विचार करनेमें चतुर, द्यूत, पान आदि व्यसन तथा व्यभिचारसे रहित ॥ १६ ॥ अधीतव्यवहारार्थं मौलं ख्यातं विपश्चितम् । अर्थस्योत्पादकं चैव विदध्यान्मन्त्रिणं नृपः' ॥ १७ ॥ युद्ध इत्यादि व्यवहारको जानने वाला, कुलीन, विख्यात पण्डित, धन उत्पन्न करने वाला ऐसेको राजा मंत्री बनावे' ॥ १७ ॥ अत्रान्तरे शुकेनोक्तम्—'देव ! कर्पूरद्वीपादयो लघुद्वीपा जम्बु- द्वीपान्तर्गता एव । तत्रापि देवपादानामेवाधिपत्यम्' । ततो राज्ञाप्युक्तम्—'एवमेव । इस अवसरमें तोतेने कहा-'महाराज ! कर्पूरद्वीप आदि छोटे छोटे द्वीप जम्बूद्वीपकेही भीतर हैं और वहाँभी महाराजकाही राज्य है ।' राजाभी फिर बोला-'ऐसाही है; यतः,— राजा मत्तः शिशुश्चैव प्रमादी धनगर्वितः । अप्राप्यमपि वाञ्छन्ति किं पुनर्लभ्यतेऽपि यत्' ॥ १८ ॥ क्योंकि—राजा, विक्षिप्त, बालक, प्रमादी, धन का अहंकारी, ये दुर्लभ वस्तु- कीभी इच्छा किया करते हैं, फिर जो मिल सकती है उसका तो कहनाही क्या है ? ॥ १८ ॥ ततो मयोक्तम्—'यदि वचनमात्रेणैवाधिपत्यं सिद्ध्यति तदा जम्बुद्वीपेऽप्यस्मत्प्रभोर्हिरण्यगर्भस्य स्वाम्यमस्ति ।' शुको ब्रूते— 'कथमत्र निर्णयः ?' । मयोक्तम्—'संग्राम एव ।' राज्ञा विहस्यो- क्तम्—'स्वस्वामिनं गत्वा सजीकुरु ! तदा मयोक्तम्—'स्वदूतोऽपि प्रस्थाप्यताम् ।' राजोवाच—'कः प्रयास्यति दौत्येन ? यत एवंभूतो दूतः कार्यः,— फिर मैंने कहा कि, जो केवल कहनेसेही राज्य सिद्ध हो जाता है तो जम्बूद्वीपमेंभी हमारे स्वामी हिरण्यगर्भका राज्य है ।' तोता बोला—'इसमें कैसे निर्णय हो ?' मैंने कहा—'संग्रामही है ।' राजाने हँस कर कहा-'अपने स्वामीको
१६६ हितोपदेशः [ विग्रहः १९- जा कर तयार कर।' तब मैंने कहा—'अपने दूतकोभी भेजिये।' राजाने कहा- 'दूत बन कर कौन जायगा ? क्योंकि ऐसा दूत करना चाहिये;— भक्तो गुणी शुचिर्दक्षः प्रगल्भोऽव्यसनी क्षमी । ब्राह्मणः परमर्मज्ञो दूतः स्यात्प्रतिभानवान्' ॥ १९ ॥ भक्त अर्थात् राजाका हितकारी, गुणवान्, शुद्ध अर्थात् उत्कोच (रिशबत) आदि लाभरहित, कार्यमें चतुर, बोल-चालमें निपुण, द्यूत, पान आदि व्यसनसे रहित, क्षमाशील, ब्राह्मण, शत्रुके भेदको जानने वाला और बुद्धिमान् दूत होना चाहिये ॥ १९ ॥ गृध्रो वदति—'सन्त्येव दूता बहवः । किंतु ब्राह्मण एव कर्तव्यः । सिद्ध बोला—'दूत तो बहुतसे हैं परन्तु ब्राह्मणकोही करना चाहिये । यतः,— प्रसादं कुरुते पत्युः संपत्तिं नाभिवाञ्छति । कालिमा कालकूटस्य नापैतीश्वरसंगमात्' ॥ २० ॥ क्योंकि-वह स्वामीको प्रसन्न करता है और संपत्तिको नहीं चाहता है, और जैसे महादेवजीके संगसे विषका कालापन नहीं जाता है वैसेही इसकीभी प्रकृति नहीं बदलती है ॥ २० ॥ राजाह—'ततः शुक एव व्रजतु । शुक ! त्वमेवानेन सह गत्वा- स्मदभिलषितं ब्रूहि ।' शुको ब्रूते—'यथाज्ञापयति देवः । किन्त्वयं दुर्जनो बकः । तदनेन सह न गच्छामि ॥ राजा बोला-'फिर तोताही जाय; हे तोते ! तूही इसके साथ वहाँ जा कर हमारा इष्ट (संदेशा) कह दे।' तोता बोला—'जो आज्ञा श्रीममहाराजकी । पर यह बगुला दुष्ट है। इसलिये इसके साथ नहीं जाऊँगा। तथा चोक्तम्,— खलः करोति दुर्वृत्तं नूनं फलति साधुषु । दशाननोऽहरत्सीतां बन्धनं स्यान्महोदधेः ॥ २१ ॥ जैसा कहा है—दुष्ट जो बुराई करता है वह बुराई सचमुच साधुओं पर फलती (असर करती) है, अर्थात् उन्हें दुःख भुगतना पड़ता है। जैसे रावण सीताको हर ले गया पर समुद्र बाँधा गया ॥ २१ ॥
राजा बोला-'यह कथा कैसे है ?' तोता कहने लगा ।—
-२२ ] दुर्जनके साथ सहवास करनेका फल १६७ अपरं च,— न स्थातव्यं न गन्तव्यं दुर्जनेन समं क्वचित् । काकसङ्गाद्धतो हंसस्तिष्ठन् गच्छंश्च वर्तकः ॥ २२ ॥' और दूसरे-दुष्टके साथ कभी न तो बैठना चाहिये और न जाना चाहिये, जैसे कौएके साथ रह कर हंस और उड़ता हुआ बटेर मारे गये' ॥ २२ ॥ राजोवाच—'कथमेतत् ?' । शुकः कथयति— राजा बोला-'यह कथा कैसे है ?' तोता कहने लगा ।— कथा ५ [ हंस, कौआ और एक मुसाफिरकी कहानी ५ ] 'अस्त्युज्जयिनीवर्त्मप्रान्तरे प्लक्षतरुः । तत्र हंसकाकौ निवसतः । कदाचिद्ग्रीष्मसमये परिश्रान्तः कश्चित्पथिकस्तत्र तरुतले धनुः- काण्डं संनिधाय सुप्तः । तत्र क्षणान्तरे तन्मुखाद्वृक्षच्छायापगता । ततः सूर्यतेजसा तन्मुखं व्याप्तमवलोक्य तद्वृक्षस्थितेन हंसेन कृपया पक्षौ प्रसार्य पुनस्तन्मुखे छाया कृता । ततो निर्भरनिद्रासुखिना तेन मुखव्यादानं कृतम् । अथ परसुखमंसहिष्णुः स्वभावदौर्जन्येन स काकस्तस्य मुखे पुरीषोत्सर्गं कृत्वा पलायितः । ततो यावदसौ पान्थ उत्थायोर्ध्वं निरीक्षते तावत्तेनावलोकितो हंसः काण्डेन हतो व्यापादितः ॥ वर्तककथामपि कथयामि— 'उज्जयिनीके मार्गमें एक पाकड़का पेड़ था । उस पर हंस और काग रहते थे । एक दिन गरमीके समय थका हुआ कोई मुसाफिर उस पेड़के नीचे धनुषबाण धरके सो गया । वहाँ थोड़ी देरमें उसके मुख परसे वृक्षकी छाया ढल गई । फिर सूर्यके तेजसे उसके मुखको तचका हुआ देख कर उस पेड़ पर बैठे हुए हंसने दया विचार पंखोंको पसार फिर उसके मुख पर छाया कर दी । फिर गहरी नींदके आनन्दसे उसने मुख फाड़ दिया । पीछे पराये सुखको नहीं सहने वाला वह काग दुष्ट स्वभावसे उसके मुखमें बीट करके उड़ गया । फिर जो उस बटोहीने उठ कर ऊपर जब देखा तब हंस दीख पड़ा, उसे बाण मारा उसे बाणसे मार दिया और वह मर गया ॥ मुसाफिरकी कथा भी कहता हूँ ।
कथा ६
१६८ हितोपदेशः [ विग्रहः २३- कथा ६ [ काक, मुसाफिर और एक ग्वालेकी कहानी ६ ] एकदा भगवतो गरुडस्य यात्राप्रसंगेन सर्वे पक्षिणः समुद्रतीरं गताः । ततः काकेन सह वर्तकश्चलितः । अथ गोपालस्य गच्छतो दधिभाण्डाद्वारंवारं तेन काकेन दधि खाद्यते । ततो यावदसौ दधिभाण्डं भूमौ निधायोर्ध्वमवलोकते तावत्तेन काकवर्तकौ दृष्टौ । ततस्तेन खेदितः काकः पलायितः । वर्तकः स्वभावानिर- पराधो मन्दगतिस्तेन प्राप्तो व्यापादितः । अतोऽहं ब्रवीमि—“न स्थातव्यं न गन्तव्यम्” इत्यादि ॥ ततो मयोक्तम्—'भ्रातः शुक ! किमेवं ब्रवीषि ? मां प्रति यथा श्रीमद्देवस्तथा भवानपि ।' शुकेनोक्तम्—'अस्त्वेवम् । एक समय गरुड़जीकी यात्राके निमित्तसे सब पक्षी समुद्रके तीर पर गये । फिर कौएके साथ एक मुसाफिरभी चला । पीछे जाते हुए अहीरकी दहीकी हाँडीमेंसे बार बार कौआ दही खाने लगा । फिर जब इसने दहीकी हाँडीको धरती पर रख कर ऊपर देखा तब उसको कौआ और बटेर दीख पड़े । फिर उससे खदेड़ा हुआ कौआ उड़ गया । और स्वभावसे अपराधहीन हौले हौले जाने वाले मुसाफिरको उसने पकड़ लिया और मार डाला । इसलिये मैं कहता हूँ- “न बैठना चाहिये और न जाना चाहिये” इत्यादि । फिर मैंने कहा-‘भाई तोते ! क्यों ऐसे कहते हो ? मुझे तो जैसे श्रीमद्महाराज हैं वैसेही तुम हो ।' तोतेने कहा-‘ऐसेही ठीक है । किन्तु,— दुर्जनैरुच्यमानानि संमतानि प्रियाण्यपि । अकालकुसुमानीव भयं संजनयन्ति हि ॥ २३ ॥ परन्तु—दुष्टोंसे कहे हुए वचन चाहे जैसे अच्छे और प्यारे हों, वे कुऋतुके ( बिना मोसमके ) पुष्पोंके समान भय उत्पन्न करतेही हैं ॥ २३ ॥ दुर्जनत्वं च भवतो वाक्यादेव ज्ञातं यदनयोर्भूपालयोर्विग्रहे भवद्वचनमेव निदानम् । और तेरा दुष्टपणा तो तेरी बातसेही जान लिया गया कि इन राजाओंके युद्धमें तेरा वचनही मूल कारण है ।
राजा बोला—'यह कथा कैसे है?' तोता कहने लगा—
- २४ ] मीठे भाषणसे मूर्खकी प्रसन्नता १६९ पश्य,— प्रत्यक्षोऽपि कृते दोषे मूर्खः सान्त्वेन तुष्यति । रथकारो निजां भार्यां सजारं शिरसाऽकरोत्' ॥ २४ ॥ देखो—मूर्ख सामने किये हुए दोषको देख कर भी मीठे मीठे वचनोंसे प्रसन्न हो जाता है, जैसे एक बढ़ईने यारसमेत अपनी स्त्रीको सिर पर धर लिया' ॥२४॥ राजोक्तम्—'कथमेतत् ?' । शुकः कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसे है?' तोता कहने लगा— कथा ७ [ एक बढई, उसकी व्यभिचारिणी स्त्री और यारकी कहानी ७ ] 'अस्ति यौवनश्रीनगरे मन्दमतिर्नाम रथकारः । स च स्वभार्यां बन्धकीं जानाति । जारेण समं स्वचक्षुषा नैकस्थाने पश्यति । ततोऽसौ रथकारः 'अहमन्यं ग्रामं गच्छामि' इत्यु- क्त्वा चलितः । कियद्दूरं गत्वा पुनरागत्य पर्यङ्कतले स्वगृहे निभृतं स्थितः । अथ 'रथकारो ग्रामान्तरं गतः' इत्युपजात- विश्वासः स जारः संध्याकाल एवागतः । पश्चात्तेन समं तस्मिन्पर्यङ्के क्रीडन्ती पर्यङ्कतलस्थितस्य भर्तुः किंचिदङ्गस्पर्शा- त्स्वामिनं मायाविनमिति विज्ञाय विषण्णाऽभवत् । ततो जारेणो- क्तम्—'किमिति त्वमद्य मया सह निर्भरं न रमसे ? विस्मितेव प्रतिभासि मे त्वम्' । तयोक्तम्—'अनभिज्ञोऽसि । मम प्राणेश्वरो येन ममाकौमारं सख्यं सोऽद्य ग्रामान्तरं गतः । तेन विना सकलजनपूर्णोऽपि ग्रामो मां प्रत्यरण्यवद्भाति । 'किं भावि, तत्र परस्थाने, किं खादितवान्, कथं वा प्रसुप्तः' इत्यस्मद्धृदयं विदीर्यते ।' जारो ब्रूते—'तव किमेवं स्नेहभूमी रथकारः ?' बन्धक्यवदत्— 'रे बर्बर ! किं वदसि ? 'यौवनश्रीनगरमें मंदमति नाम बढ़ई रहता था, और वह अपनी स्त्रीको व्यभिचारिणी समझता था । पर यारके संग अपनी आँखोंसे एक स्थानमें नहीं देखता था । बाद यह बढ़ई “मैं दूसरे गाँवको जाता हूँ” यह कह कर चला गया । थोड़ी दूर जा कर और फिर लौट आ कर पलंगके नीचे अपने घरमें छुप कर
१७० हितोपदेशः [ विग्रह २५- बैठ गया । फिर, 'बढ़ई दूसरे गाँवको गया' इस विश्वासके मारे वह यार दिन डूबतेही आ गया । पीछे उसके साथ उसी पलंग पर क्रीड़ा करती हुई पलंगके नीचे बैठे हुए स्वामीकी देहके (स्वल्पसा) छूजानेसे स्वामीको छलिया जान कर उदास हो गई । तब यारने कहा-'क्या बात है ? तू आज मेरे साथ जी खोल कर नहीं रमण करती है ? तू मुझे कुछ दुचित्ती-सी समझ पड़ती है।' उसने कहा-'तू नहीं जानता है । मेरा प्राणप्यारा कि जिसके साथ मेरी बाल्यावस्थासे प्रीति है सो आज दूसरे गाँवको गया है। उसके बिना सब जनोंसे भरा हुआभी यह गाँव मुझे अरण्य-सा जान पड़ता है । क्या होनहार है, वहाँ दूसरे स्थानमें क्या खाया होगा अथवा कैसे सोया होगा इस सोचसे मेरा हिरदा फटा जा रहा है ।' यारने कहा-'क्या तेरा बढ़ई ऐसा स्नेह करने वाला है ?' व्यभि- चारिणी स्त्री बोली-'अरे धूर्त ! क्या पूछता है ? शृणु,— परुषाण्यपि या प्रोक्ता दृष्टा या क्रोधचक्षुषा । सुप्रसन्नमुखी भर्तुः सा नारी धर्मभागिनी ॥ २५ ॥ सुन—पुरुष चाहे वैसे निष्ठुर वचन स्त्रीसे कहे और क्रोधकी आँखसे देखे परंतु पतिके सामने मुखको जो प्रसन्न रक्खे वह स्त्री ही धर्मकी अधिकारिणी है ॥ २५ ॥ अपरं च,— नगरस्थो वनस्थो वा पापो वा यदि वा शुचिः । यासां स्त्रीणां प्रियो भर्ता तासां लोका महोदयाः ॥ २६ ॥ और दूसरे–नगरमें रहे, अथवा वनमें रहे, पापी हो अथवा पुण्यात्मा हो जिन स्त्रियोंको पति प्यारा है उन्हींका संसारमें बड़ा भाग्योदय है ॥ २६ ॥ अन्यच्च,— भर्ता हि परमं नार्या भूषणं भूषणैर्विना । एषा विरहिता तेन शोभनापि न शोभना ॥ २७ ॥ और स्त्रियोंका भूषणोंके विनाही पति परम भूषण है, उससे रहित यह स्त्री रूपवतीभी कुरूपा है ॥ २७ ॥