हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुचर पक्षियोंने मुझे दग्ध नाम वनमें चुगते देखा, और पूछा—'तू कौन है ? कहाँसे आया है ?' तब मैंने कहा—'कर्पूरद्वीपके चक्रवर्ती राजा हिरण्यगर्भ राज- हंसका मैं अनुचर हूँ । अभिलाषासे नये देश देखनेको आया हूँ ।' यह सुन कर पक्षियोंने कहा—'इन दोनों देशोंमेंसे कोनसा देश तथा राजा अच्छा है ?' मैंने कहा—'अजी ! क्यों ऐसे कहते हो ? इन दोनोंमें बड़ा अन्तर है, क्योंकि कर्पूरद्वीप मानों स्वर्गही है, और राजहंस मानों दूसरा इन्द्र है । इस मारवाड़ देशमें पड़े हुए तुम क्या करते हो ? हमारे देशमें चलो ।' तब मेरी बात सुन कर सब क्रोधित हो गये । तथा चोक्तम्,— पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्धनम् । उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये ॥ ४ ॥ जैसा कहा है कि—सांपोंको दूध पिलाना केवल जहरको बढानां है, मूर्खोंको उपदेश करना भी क्रोध बढानेके लिये है, शान्तिके लिये नहीं; अर्थात् सांपको दूध पिलाना जैसा विषको बढाने वाला है वैसाही मूर्खको किया हुआ उपदेश क्रोधको बढाने वाला है; शांति करने वाला नहीं ॥ ४ ॥ अन्यच्च,— विद्वानेवोपदेष्टव्यो नाविद्वांस्तु कदाचन । वानरानुपदिश्याथ स्थानभ्रष्टा ययुः खगाः' ॥ ५ ॥ और दूसरे–बुद्धिमान्कोही उपदेश करना चाहिये, मूर्खको कभी न करे, जैसे पक्षी बन्दरोंको उपदेश करनेसे स्थान छोड़ कर चले गये' ॥ ५ ॥ राजोवाच—'कथमेतत् ?'। दीर्घमुखः कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसे है?' दीर्घमुख कहने लगा— कथा २ [ पक्षी और बंदरोंकी कहानी २ ] 'अस्ति नर्मदातीरे विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र निर्मितनीड- क्रोडे पक्षिणो निवसन्ति सुखेन । अथैकदा वर्षासु नीलपटलैरा- वृते नभस्तले धारासारैर्महती वृष्टिर्बभूव । ततो वानरांश्च तरुतलेऽवस्थिताञ्शीताकुलान् कम्पमानानवलोक्य कृपया पक्षिभिरुक्तम्—'भो भो वानराः ! शृणुत,—