भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

'नर्मदाके तीर पर एक बड़ा सेमरका वृक्ष है । उस पर पक्षी घोंसला बना कर उसके भीतर, सुखसे रहा करते थे । फिर एक दिने बरसातमें नीले नीले बादलों से आकाशमंडलके छा जाने पर बड़ी बड़ी बूँदोंसे मूसलधार मेघ बरसने लगा और फिर वृक्षके नीचे बैठे हुए बन्दरोंको ठंडीके मारे थर थर काँपते हुए देख कर पक्षियोंने दयासे विचार कहा—'अरे भाई बन्दरो ! सुनो,—

अस्माभिर्निर्मिता नीडाश्चञ्चुमात्राहृतैस्तृणैः । हस्तपादादिसंयुक्ता यूयं किमिति सीदथ ?' ॥ ६ ॥

हमने केवल अपनी चोंचोंसे इकट्ठे किये हुए तिनकोंसे घोंसले बनाये हैं, और तुम तो हाथ, पाँव आदिसे युक्त हो कर फिर ऐसा दुःख क्यों भोगते हो ?' ॥

तच्छ्रुत्वा वानरैर्जातामर्षैरालोचितम्—'अहो ! निर्वातनीड- गर्भावस्थिताः सुखिनः पक्षिणोऽस्मान्निन्दन्ति । भवतु तावद्वृष्टे- रुपशमः ।' अनन्तरं शान्ते पानीयवर्षे तैर्वानरैर्वृक्षमारुह्य सर्वे नीडा भग्नास्तेषामण्डानि चाधः पातितानि । अतोऽहं ब्रवीमि— “विद्वानेवोपदेष्टव्यः” इत्यादि ।' राजोवाच-‘ततस्तैः किं कृतम् ?' बकः कथयति—‘ततस्तैः पक्षिभिः कोपादुक्तम्—‘केनासौ राज- हंसो राजा कृतः?' । ततो मयोपजातकोपेनोक्तम्—‘युष्मदीय- मयूरः केन राजा कृतः ?' एतच्छ्रुत्वा ते सर्वे मां हन्तुमुद्यताः । ततो मयापि स्वविक्रमो दर्शितः ।

यह सुन बन्दरोंने झुँझला कर विचारा—‘अरे ! पवनरहित घोंसलोंके भीतर बैठे हुए सुखी पक्षी हमारी निन्दा करते हैं, करने दो । जब तक वर्षा बंद हो बाद जब पानीका बरसना बंद हो गया तब उन बन्दरोंने पेड़ पर चढ़ कर सब घोंसले तोड़ डाले, और उन्होंने अंडे नीचे गिरा दिये, इसलिये मैं कहता हूँ- “बुद्धिमान्‌कोही उपदेश करना चाहिये” इत्यादि ।' राजा बोला-‘तब उन्होंने क्या किया ?' बगुला कहने लगा-फिर उन पक्षियोंने क्रोधसे कहा-‘किसने इस राज- हंसको राजा बनाया है?' तब मैंने झुँझला कर कहा-‘तुम्हारे मोरको किसने राजा बनाया है?' यह सुन कर वे सब मुझे मारनेको तयार हुए । तब मैंनेभी अपना पराक्रम दिखाया ।