भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 302 में से

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पृष्ठ 188

१६८ हितोपदेशः [ विग्रहः २३- कथा ६ [ काक, मुसाफिर और एक ग्वालेकी कहानी ६ ] एकदा भगवतो गरुडस्य यात्राप्रसंगेन सर्वे पक्षिणः समुद्रतीरं गताः । ततः काकेन सह वर्तकश्चलितः । अथ गोपालस्य गच्छतो दधिभाण्डाद्वारंवारं तेन काकेन दधि खाद्यते । ततो यावदसौ दधिभाण्डं भूमौ निधायोर्ध्वमवलोकते तावत्तेन काकवर्तकौ दृष्टौ । ततस्तेन खेदितः काकः पलायितः । वर्तकः स्वभावानिर- पराधो मन्दगतिस्तेन प्राप्तो व्यापादितः । अतोऽहं ब्रवीमि—“न स्थातव्यं न गन्तव्यम्” इत्यादि ॥ ततो मयोक्तम्—'भ्रातः शुक ! किमेवं ब्रवीषि ? मां प्रति यथा श्रीमद्देवस्तथा भवानपि ।' शुकेनोक्तम्—'अस्त्वेवम् । एक समय गरुड़जीकी यात्राके निमित्तसे सब पक्षी समुद्रके तीर पर गये । फिर कौएके साथ एक मुसाफिरभी चला । पीछे जाते हुए अहीरकी दहीकी हाँडीमेंसे बार बार कौआ दही खाने लगा । फिर जब इसने दहीकी हाँडीको धरती पर रख कर ऊपर देखा तब उसको कौआ और बटेर दीख पड़े । फिर उससे खदेड़ा हुआ कौआ उड़ गया । और स्वभावसे अपराधहीन हौले हौले जाने वाले मुसाफिरको उसने पकड़ लिया और मार डाला । इसलिये मैं कहता हूँ- “न बैठना चाहिये और न जाना चाहिये” इत्यादि । फिर मैंने कहा-‘भाई तोते ! क्यों ऐसे कहते हो ? मुझे तो जैसे श्रीमद्महाराज हैं वैसेही तुम हो ।' तोतेने कहा-‘ऐसेही ठीक है । किन्तु,— दुर्जनैरुच्यमानानि संमतानि प्रियाण्यपि । अकालकुसुमानीव भयं संजनयन्ति हि ॥ २३ ॥ परन्तु—दुष्टोंसे कहे हुए वचन चाहे जैसे अच्छे और प्यारे हों, वे कुऋतुके ( बिना मोसमके ) पुष्पोंके समान भय उत्पन्न करतेही हैं ॥ २३ ॥ दुर्जनत्वं च भवतो वाक्यादेव ज्ञातं यदनयोर्भूपालयोर्विग्रहे भवद्वचनमेव निदानम् । और तेरा दुष्टपणा तो तेरी बातसेही जान लिया गया कि इन राजाओंके युद्धमें तेरा वचनही मूल कारण है ।

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