हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-२२ ] दुर्जनके साथ सहवास करनेका फल १६७ अपरं च,— न स्थातव्यं न गन्तव्यं दुर्जनेन समं क्वचित् । काकसङ्गाद्धतो हंसस्तिष्ठन् गच्छंश्च वर्तकः ॥ २२ ॥' और दूसरे-दुष्टके साथ कभी न तो बैठना चाहिये और न जाना चाहिये, जैसे कौएके साथ रह कर हंस और उड़ता हुआ बटेर मारे गये' ॥ २२ ॥ राजोवाच—'कथमेतत् ?' । शुकः कथयति— राजा बोला-'यह कथा कैसे है ?' तोता कहने लगा ।— कथा ५ [ हंस, कौआ और एक मुसाफिरकी कहानी ५ ] 'अस्त्युज्जयिनीवर्त्मप्रान्तरे प्लक्षतरुः । तत्र हंसकाकौ निवसतः । कदाचिद्ग्रीष्मसमये परिश्रान्तः कश्चित्पथिकस्तत्र तरुतले धनुः- काण्डं संनिधाय सुप्तः । तत्र क्षणान्तरे तन्मुखाद्वृक्षच्छायापगता । ततः सूर्यतेजसा तन्मुखं व्याप्तमवलोक्य तद्वृक्षस्थितेन हंसेन कृपया पक्षौ प्रसार्य पुनस्तन्मुखे छाया कृता । ततो निर्भरनिद्रासुखिना तेन मुखव्यादानं कृतम् । अथ परसुखमंसहिष्णुः स्वभावदौर्जन्येन स काकस्तस्य मुखे पुरीषोत्सर्गं कृत्वा पलायितः । ततो यावदसौ पान्थ उत्थायोर्ध्वं निरीक्षते तावत्तेनावलोकितो हंसः काण्डेन हतो व्यापादितः ॥ वर्तककथामपि कथयामि— 'उज्जयिनीके मार्गमें एक पाकड़का पेड़ था । उस पर हंस और काग रहते थे । एक दिन गरमीके समय थका हुआ कोई मुसाफिर उस पेड़के नीचे धनुषबाण धरके सो गया । वहाँ थोड़ी देरमें उसके मुख परसे वृक्षकी छाया ढल गई । फिर सूर्यके तेजसे उसके मुखको तचका हुआ देख कर उस पेड़ पर बैठे हुए हंसने दया विचार पंखोंको पसार फिर उसके मुख पर छाया कर दी । फिर गहरी नींदके आनन्दसे उसने मुख फाड़ दिया । पीछे पराये सुखको नहीं सहने वाला वह काग दुष्ट स्वभावसे उसके मुखमें बीट करके उड़ गया । फिर जो उस बटोहीने उठ कर ऊपर जब देखा तब हंस दीख पड़ा, उसे बाण मारा उसे बाणसे मार दिया और वह मर गया ॥ मुसाफिरकी कथा भी कहता हूँ ।