भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

-११] शूर और डरपोक योद्धाओंके लक्षण १८९ वैसा ही कहा है-घोड़ों पर चढ़कर लड़ने वाले देवताओंसे भी नहीं जीते जा सकते हैं, क्योंकि उनको दूरके वैरी भी अपने हाथके पास दीखते हैं ॥८५॥ प्रथमं युद्धकारित्वं समस्तबलपालनम् । दिङ्मार्गाणां विशोधित्वं पत्तिकर्म प्रचक्षते ॥ ८६ ॥ हस्ती आदि सब चतुरंग सेनाकी रक्षा करना, युद्धकी पहली चतुरता है और दिशाओंके आने जानेके मार्गोंको काट कर युद्ध कर देना यह पैदल सेनाका काम कहते हैं ॥ ८६ ॥ स्वभावशूरमस्त्रज्ञमविरक्तं जितश्रमम् । प्रसिद्धक्षत्रियप्रायं बलं श्रेष्ठतमं विदुः ॥ ८७ ॥ स्वभावहीसे शूर वीर, अस्त्रके चलानेमें चतुर, लड़ाईमें पीठ नही देने वाले, परिश्रमको सहने वाले और वीरतामें प्रसिद्ध क्षत्रियोंके समान, ऐसी सेनाको पण्डित लोग सबसे उत्तम कहते हैं ॥ ८७ ॥ यथा प्रभुकृतान्मानाद्युध्यन्ते भुवि मानवाः । न तथा बहुभिर्दत्तैर्द्रविणैरपि भूपते ! ॥ ८८ ॥ हे राजा ! पृथ्वी पर स्वामीके सन्मान करनेसे जैसे मनुष्य लड़ते हैं वैसे बहुत दिये हुए, धनसेभी नहीं लड़ते हैं ॥ ८८ ॥ वरमल्पबलं सारं न कुर्यान्मुण्डमण्डलीम् । कुर्यादसारभङ्गो हि सारभङ्गमपि स्फुटम् ॥ ८९ ॥ बलवान् थोड़ी-सी सेना अच्छी होती है किंतु बहुत-सी मुंडोंकी मंडली अर्थात् बलहीन सेना इकट्ठी न करनी चाहिये, क्योंकि दुर्बलोंका पीठ दे कर संग्रामसे भागना साक्षात् बलवान् सेनाका भी उत्साहभंग कर देता है; याने कायर सेना भाग जाने पर वीरभी उन्हें देख कर कभी कभी भाग उठते हैं ॥ ८९ ॥ अप्रसादोऽनधिष्ठानं देयांशहरणं च यत् । कालयापोऽप्रतीकारस्तद्वैराग्यस्य कारणम् ॥ ९० ॥ अप्रसन्न होना, अधिकारी न करना, लूटे हुए धनको आपही ले लेना, वेतन आदि देनेमें आज-कल कह कर समय बिताना, और सेनाके विरोध आदिमें उपाय न करना ये वैराग्यके अर्थात् स्नेह छूटनेके कारण हैं ॥ ९० ॥ आपीडयन्बलं शत्रोर्जिगीषुरतिशोषयेत् । सुखसाध्यं द्विषां सैन्यं दीर्घयानप्रपीडितम् ॥ ९१ ॥