भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 210

१९० हितोपदेशः [ विग्रहः ९२- विजय पानेकी इच्छा करने वाला राजा अपनी सेनाको विश्राम देता हुआ शत्रुसे जा भिड़े, क्योंकि लंबे मार्ग चलनेसे थकी थकाई शत्रुओंकी सेना सहजमें जीती जा सकती है ॥ ९१ ॥ दायादादपरो मन्त्रो नास्ति भेदकरो द्विषाम् । तस्मादुत्थापयेद्यत्नाद्दायादं तस्य विद्विषः ॥ ९२ ॥ वैरियाँके भाईबेटोंको छोड़ कर फूट कराने वाला दूसरा मंत्र (उपाय) नहीं है, इसलिये उस शत्रुके नाते-गोतेके पुरुषको प्रयत्नसे उकसावे अर्थात् तोड़ फोड़ कर अपनी ओर मिलावे ॥ ९२ ॥ संधाय युवराजेन यदि वा मुख्यमन्त्रिणा । अन्तःप्रकोपनं कार्यमभियोक्तुः स्थिरात्मनः ॥ ९३ ॥ युवराजके साथ अथवा मुख्य मंत्रीके साथ संधि (मेल) करके निश्चित्ताईसे बैठे-ठाले शत्रुके घरमें फूट करा देनी चाहिये ॥ ९३ ॥ क्रूरं मित्रं रणे चापि भङ्गं दत्त्वा विघातयेत् । अथवा गोग्रहाकृष्ट्या तल्लक्ष्याश्रितबन्धनात् ॥ ९४ ॥ युद्धमें हरा कर भी क्रूर मित्र (राजा) को मार डाले अथवा जैसे गौको खींच कर बाँधते हैं वैसे ही उसके मुख्य सहायक राजाओंको बंधनमें डाल कर उसे मार देना चाहिये ॥ ९४ ॥ स्वराज्यं वासयेद्राजा परदेशावगाहनात् । अथवा दानमानाभ्यां वासितं धनदं हि तत् ॥ ९५ ॥ और राजा शत्रुके राज्यसे मनुष्योंको पकड़ ला कर अपने राज्यमें बसावे, अथवा धन और आदरसे बसाया हुआ वह राज्य ही धन देने वाला होता है' ॥९५॥ राजाह—‘आः ! किं बहुनोदितेन ? राजा बोला—‘अजी ! बहुत बातोंसे क्या है ? आत्मोदयः परग्लानिर्द्वयं नीतिरितीयती । तदूरीकृत्य कृतिभिर्वाचस्पत्यं प्रतीयते’ ॥ ९६ ॥ अपना लाभ और शत्रुको हानि नीति तो यही है। बुद्धिमान् लोग इसीको स्वीकार करके अपनी चतुरता प्रकट करते हैं ॥ ९६ ॥ मन्त्रिणा विहस्योच्यते—‘सर्वमेतद्विशेषतश्चोच्यते ! मंत्रीने हँस कर कहा-‘यह तो सबमे बढ़ कर बात आप कहते हैं,