हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 224, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें२०४ हितोपदेशः [ विग्रहः १२१- मन्त्रिणां भिन्नसंधाने भिषजां सांनिपातिके । कर्मणि व्यज्यते प्रज्ञा सुस्थे को वा न पण्डितः ? ॥१२१॥ लड़ाईके समय शत्रुसे मेल करनेमें मंत्रियोंकी, सन्निपात(ज्वर) रोगमें वैद्योंकी और कार्योंके साधनमें दूसरोंकी बुद्धि जानी जाती है, और यों बैठें ठाले कौन पण्डित नहीं है ? ॥ १२१ ॥ अपरं च,— आरभन्तेऽल्पमेवाज्ञाः कामं व्यग्रा भवन्ति च । महारम्भाः कृतधियस्तिष्ठन्ति च निराकुलाः ॥ १२२ ॥ और दूसरे-बुद्धिहीन, छोटे ही कामका आरम्भ करते हैं और अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं । बुद्धिमान् बड़े बड़े काम करते हैं और कभी विकल नहीं होते हैं ॥ १२२ ॥ तदत्र भवत्प्रतापादेव दुर्ग भङ्क्त्वा कीर्तिप्रतापसहितं त्वामचि- रेण कालेन विन्ध्याचलं नेष्यामि।' राजाह—'कथमधुना स्वल्प- बलेन तत्संपद्यते?' । गृध्रो वदति—'देव ! सर्वं भविष्यति । यतो विजिगीषोरदीर्घसूत्रता विजयसिद्धेरवश्यंभावि लक्षणम् । तत्सहसैव दुर्गावरोधः क्रियताम्।' इसलिये यहाँ आपके पुण्यप्रतापसेही गढ़को तोड़ फोड़ यश और पराक्रम- सहित आपको शीघ्र विंध्याचलको ले चलूँगा।' राजा बोला-'अब थोड़ीसी सेनासे यह कैसे होगा ?' गिद्धने कहा-'महाराज ! सब कुछ हो जायगा । क्योंकि जय चाहने वालेको दीर्घसूत्रता (कालक्षेप) न होना ही जयकी सिद्धिका अवश्य होनहार लक्षण है । इसलिये एकाएक ही गढ़ चारों ओरसे घेर लीजिये।' प्रहितप्रणिधिना बकेनागत्य हिरण्यगर्भस्य तत्कथितम्—'देव ! स्वल्पबल एवायं राजा चित्रवर्णो गृध्रस्य मन्त्रोपस्तम्भेन दुर्गावरोधं करिष्यति । राजाह—'सर्वज्ञ, किमधुना विधेयम् ?' चक्रो ब्रूते— 'स्वबले सारासारविचारः क्रियताम्।' तज्ज्ञात्वा सुवर्णवस्त्रादिकं यथार्हं प्रसादप्रदानं क्रियताम् । १ बात, पित्त और कफ इन तीन दोषोंके संनिपातसे होने वाला ज्वर या अन्य रोग भयंकर प्राणघातक माने गये हैं।