भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 225

-१२५ ] बगुलेका हिरण्यगर्भको निवेदन २०५ भेजे हुए दूत बगुलेने लौट कर राजा हिरण्यगर्भसे यह कहा-'महाराज ! राजा चित्रवर्णके पास थोड़ी ही सेना रह गई है, गिद्धके उपदेशसे गढ़ घेरेगा ।' राजा बोला-'हे सर्वज्ञ ! अब क्या करना चाहिये ?' चकवा बोला-'अपनी सेनामें निर्बल और प्रबलका विचार कर लीजिये । वह जान कर सुवर्ण कपड़े आदि जो जिस योग्य हो उसे प्रसन्नताका दान ( अर्थात ) पारितोषिक दीजिये ॥ यतः,— यः काकिनीमप्यपथप्रपन्नां समुद्धरेन्निष्कसहस्रतुल्याम् । कालेषु कोटिष्वपि मुक्तहस्त- स्तं राजसिंहं न जहाति लक्ष्मीः ॥ १२३ ॥ क्योंकि—जो राजा बुरे मार्गमें पडी हुई एक कौडीको भी हजार मोहरोंके समान जान कर उठा लेता है और फिर किसी उचित समय पर करोड़ों रुपये खर्च कर डालता है उस श्रेष्ठ राजा को लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ती है ॥ १२३ ॥ अन्यच्च,— ऋतौ विवाहे व्यसने रिपुक्षये यशस्करे कर्मणि मित्रसंग्रहे । प्रियासु नारीष्वधनेषु बान्धवे- ष्वतिव्ययो नास्ति नराधिपाष्टसु ॥ १२४ ॥ और दूसरे-महाराज ! यज्ञमें, विवाहमें, विपत्तिमें, शत्रुके नाश करनेमें, यश बढ़ाने वाले कार्यमें, मित्रके आदरमें, प्रिय स्त्रियोंमें, निर्धन बान्धवोंमें इन आठ बातोंमें व्यय वृथा नहीं कहाता है ॥ १२४ ॥ यतः,— मूर्खः स्वल्पव्ययत्रासात्सर्वनाशं करोति हि । कः सुधीः संत्यजेद्भाण्डं शुल्कस्यैवातिसाध्वसात्' ॥ १२५ ॥ क्योंकि मूर्ख थोड़े व्ययके भयसे निश्चय करके सर्वनाश कर देता है, और कौनसा बुद्धिमान् राज्यके भयसे अपनी दुकानके द्रव्य आदिको छोड़ देता है ? ॥ १२५ ॥ राजाह-'कथमिह समयेऽतिव्ययो युज्यते ? उक्तं च-“आपदर्थे धनं रक्षेत्” इति ।' मन्त्री ब्रूते-'श्रीमतः कथमापदः ?' । राजाह—