भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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२०६ हितोपदेशः [ विग्रहः १२६- 'कदाचिच्चलते लक्ष्मीः ।' मन्त्री ब्रूते—'संचितापि विनश्यति । तद्देव ! कार्पण्यं विमुच्य दानमानाभ्यां स्वभटाः पुरस्क्रियन्ताम् । राजा बोला-'इस समय अधिक व्यय क्यों करना चाहिये ? कहा भी है- "आपत्तिके नाशके लिये धनकी रक्षा करे" इत्यादि ।' मंत्री बोला-'लक्ष्मीवान्को आपत्ति कहाँ ?' राजा बोला-'जो लक्ष्मी चली जाय तो ?' मंत्री बोला-'संचित धन भी नष्ट हो जाय तो ? इसलिये महाराज ! कृपणताको छोड़ दान और मानसे अपने शूर वीरोंका आदर कीजिये । तथा चोक्तम्,— परस्परज्ञाः संहृष्टास्त्यक्तुं प्राणान्सुनिश्चिताः । कुलीनाः पूजिताः सम्यग्विजयन्ते द्विषद्बलम् ॥ १२६ ॥ जैसा कहा है-आपसमें एक दूसरेकी सहायता करनेवाले, प्रसन्नचित्त, प्राणोंको ( स्वामीके लिये संग्राममें ) झोंकने वाले, ( शत्रुके मारनेका निश्चय संकल्प करने वाले, श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुए ) और अच्छे प्रकारसे सन्मान किये गये ऐसे शूरवीर शत्रु की सेनाको विजय करते हैं ॥ १२६ ॥ अपरं च,— सुभटाः शीलसंपन्नाः संहताः कृतनिश्चयाः । अपि पञ्चशतं शूरा निघ्नन्ति रिपुवाहिनीम् ॥ १२७ ॥ और दूसरे-अच्छे स्वभाव वाले, आपसमें मिले हुए, और बिना-मरें मारे नहीं लड़ेंगे ऐसा निश्चय करने वाले, पाँच सौ भी बड़े बड़े शूर वीर योधा वैरीकी सेनाका नाश कर देते हैं ॥ १२७ ॥ किं च,— शिष्टैरप्यविशेषज्ञ उग्रश्च कृतनाशकः । त्यज्यते किं पुनर्नान्यैश्चाप्यात्मम्भरिर्नरः ॥ १२८ ॥ और महामूर्ख, दुष्ट प्रकृति वाला, कृतघ्न और स्वार्थी मनुष्यको सज्जन भी छोड़ देते हैं; फिर दूसरोंका क्या कहना है ? अर्थात् ऐसेको सब त्याग देते हैं ॥ १२८ ॥ यतः,— सत्यं शौर्यं दया त्यागो नृपस्यैते महागुणाः । एभिर्मुक्तो महीपालः प्राप्नोति खलु वाच्यताम् ॥ १२९ ॥

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