भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

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२०८ हितोपदेशः [ विग्रहः १३५-

अथागत्य प्रणम्य मेघवर्णो ब्रूते—'देव ! दृष्टिप्रसादं कुरु । इदानीं विपक्षो दुर्गद्वारि वर्तते । तद्देवपादादेशाद्बहिर्निःसृत्य स्वविक्रमं दर्शयामि । तेन देवपादानामानृण्यमुपगच्छामि ।' चक्रो ब्रूते—'मैवम् । यदि बहिर्निःसृत्य योद्धव्यं तदा दुर्गाश्रयण- मेव निष्प्रयोजनम् ।

फिर मेघवर्णने आ कर प्रणाम करके कहा—'हे महाराज ! कृपा कर देख लीजिये । अब शत्रु गढ़के द्वारमें आ पहुँचा है। इसलिये आपकी आज्ञासे बाहर निकल कर अपना पराक्रम दिखलाऊँ जिससे महाराजके ऋणसे मैं उनंतर हो जाऊँ।' चकवा बोला—'ऐसा मत कर, जो बाहर निकल कर हम लड़ेंगे तो गढ़का आसरा ही वृथा है।

अपरं च,— विषमो हि यथा नक्रः सलिलान्निर्गतोऽवशः । वनाद्विनिर्गतः शूरः सिंहोऽपि स्याच्छृगालवत् ॥ १३५ ॥

और दूसरे—जैसे भयंकर मगर पानीसे बाहर निकल कर विवश हो जाता है, वैसे ही वनसे निकल कर पराक्रमी सिंह भी गीदड़के समान हो जाता है ॥१३५॥

देव ! स्वयं गत्वा दृश्यतां युद्धम् । महाराज ! आप चल कर युद्ध देखिये;

यतः,— पुरस्कृत्य बलं राजा योधयेदवलोकयन् । स्वामिनाधिष्ठितः श्वापि किं न सिंहायते ध्रुवम् ?' ॥१३६॥

क्योंकि—राजा आप देखता हुआ सेनाको आगे करके लड़ावे, क्योंकि स्वामीसे लहकाया हुआ कुत्ता भी क्या सचमुच सिंहकी भाँति बल नहीं दिखाता है ? अर्थात् अवश्य ही दिखाता है ॥ १३६ ॥

अथ ते सर्वे दुर्गद्वारं गत्वा महाहवं कृतवन्तः । अपरेद्युश्चित्र- वर्णो राजा गृध्रमुवाच—'तात ! स्वप्रतिज्ञातमधुना निर्वाहय ।' गृध्रो ब्रूते—'देव ! शृणु तावत्;

१ 'नक्रः स्वस्थानमासाद्य गजेन्द्रमपि कर्षति'—मगर पानीमें रह कर बडे हाथी- कोभी खींच सकता है, पर बाहर निकलनेसे तो विवश हो जाता है.