हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंयतः,— अविचारयतो युक्तिकथनं तुषखण्डनम् । नीचेषूपकृतं राजन् ! बालुकास्विव मुद्रितम् ॥ ११ ॥ क्योंकि—हे राजन् ! पूर्वापरको नहीं विचारने वालेको उपाय बतलाना भुसीके पीसनेके समान बेखारथ है और नीचोंमें उपकार करना धुलिमें चिह्न करनेके समान है, अर्थात् जैसा धुलिका चिह्न थोड़ीसी देरमें मिट जाता है वैसा नीचोंमें किया हुआ उपकार और अविचारी पुरुषोंमें उपदेश किया हुआ नष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥ महतामास्पदे नीचः कदापि न कर्तव्यः । ऊँचे ओहदे पर नीचकी नियुक्ति कभी नहीं करनी चाहिये । जैसा कहा है— तथा चोक्तम्,— नीचः श्लाघ्यपदं प्राप्य स्वामिनं हन्तुमिच्छति । मूषिको व्याघ्रतां प्राप्य मुनिं हन्तुं गतो यथा १॥ १२ ॥ नीच अच्छे पदको पा कर स्वामीको मारना चाहता है, जैसे चूहा व्याघ्रत्वको पा कर मुनिको मारने चला' ॥ १२ ॥ चित्रवर्णः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— चित्रवर्ण पूछने लगा—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।— कथा ६ [ महातप नामक संन्यासी और एक चूहेकी कहानी ६ ] 'अस्ति गौतमस्य महर्षेस्तपोवने महातपा नाम मुनिः । तत्र तेन मुनिना काकेन नीयमानो मूषिकशावको दृष्टः । ततः स्वभावदयात्मना तेन मुनिना नीवारकणैः संवर्धितः । ततो बिडालस्तं मूषिकं खादितुमुपधावति । तमवलोक्य मूषिकस्तस्य मुनेः क्रोडे प्रविवेश । ततो मुनिनोक्तम्—'मूषिक ! त्वं मार्जारो भव ।' ततः स बिडालः कुक्कुरं दृष्ट्वा पलायते । ततो मुनिनोक्तम्—'कुक्कुराद्विभेषि ? । त्वमेव कुक्कुरो भव ।' स च कुक्कुरो व्याघ्राद्विभेति । ततस्तेन मुनिना कुक्कुरो व्याघ्रः कृतः । १ 'नीचेषूपकृतं राजन् ! बालुकास्विव मूत्रितम्' यह भी पाठ प्रचलित है, जिसका अर्थ—नीच पुरुषमें उपकार करना तो सचमुच धूलि(रेत)में मूतने के समान है'