भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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  • १३ ] नीच की बड़े पदपर हानिदायिता २२३

अथ तं व्याघ्रं मुनिर्मूषिकोऽयमिति पश्यति । अथ तं मुनिं दृष्ट्वा व्याघ्रं च सर्वे वदन्ति—'अनेन मुनिना मूषिको व्याघ्रतां नीतः।' एतच्छ्रुत्वा स व्याघ्रोऽचिन्तयत्—'यावदनेन मुनिना स्थीयते तावदिदं मे रूपाख्यानमकीर्तिकरं न पलायिष्यते' इत्यालोच्य मूषिकस्तं मुनिं हन्तुं गतः । ततो मुनिना तज्ज्ञात्वा 'पुनर्मूषिको भव' इत्युक्त्वा मूषिक एव कृतः । अतोऽहं ब्रवीमि—“नीचः श्लाघ्यपदं” इत्यादि ॥ 'गौतम महर्षिके तपोवनमें महातपा नाम एक मुनि था । वहाँ उस मुनिने कौएसे लाये हुए एक चूहेके बच्चेको देखा । फिर स्वभावसे दयामय उस मुनिने तृणके धान्यसे उसको बड़ा किया । फिर बिलाव उस चूहेको खानेको दौड़ा । उसे देख कर चूहा उस मुनिकी गोदमें चला गया । फिर मुनिने कहा कि-‘हे चूहे ! तू बिलाव हो जा ।' फिर वह बिलाव कुत्तेको देख कर भागने लगा । फिर मुनिने कहा-‘तू कुत्तेसे डरता है ? जा तू भी कुत्ता हो जा।' बाद वह कुत्ता बाघसे डरने लगा । फिर उस मुनिने उस कुत्तेको बाघ कर दिया । वह मुनि, उस बाघको “यह तो चूहा है” ऐसे (उसे असली स्वरूपसे) देखता था । उस मुनिको और व्याघ्रको देख कर सब लोग कहा करते थे कि “इस मुनिने इस चूहेको बाघ बना दिया है ।” यह सुन कर वह बाघ सोचने लगा-‘जब तक यह मुनि जिंदा रहेगा तब तक यह मेरा अपयश करने वाले स्वरूपकी कहानी नहीं मिटेगी ।' यह विचार कर चूहा उस मुनिको मारनेके लिये चला । फिर मुनिने यह जान कर “फिर चूहा हो जा” यह कह कर चूहाही कर दिया । इसलिये मैं कहता हूँ—“नीच ऊँचा पद पर” इत्यादि; अपरं च, सुकरमिदमिति न मन्तव्यम् । शृणु,— और दूसरे-यह बात सुलभ है ऐसा नहीं जानना चाहिये । सुनिये,— भक्षयित्वा बहून्मत्स्यानुत्तमाधममध्यमान् । अतिलोभाद्वकः पश्चान्मृतः कर्कटकग्रहात्' ॥ १३ ॥ एक बगुला बहुतसे बड़े छोटे, और मध्यम मच्छोंको खा कर अधिक लोभसे कर्कटके पकड़नेसे मारा गया' ॥ १३ ॥ चित्रवर्णः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— चित्रवर्ण पूछने लगा—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा।—