हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 249, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीको दें । पीछे भगवान्ने क्रोधसे वरदान देने की आवश्यकतासे उन विचारहीन मूर्खोंको पार्वतीजी दे दी । तब उनके रूप और सुन्दरतासे लुभाये संसारके नाश करने वाले, मनमें उत्कंठित, कामसे अंधे तथा 'यह मेरी है मेरी है' ऐसा आपसमें झगड़ा करने वाले इन दोनोंकी "किसी निर्णय करने वाले पुरुषसे पूछना चाहिये" ऐसी बुद्धि करने पर स्वयं ईश्वर बूढ़े ब्राह्मणके वेषसे आ कर वहाँ उप- स्थित हुए । पीछे, 'हम दोनोंने अपने बलसे इनको पाया है; हम दोनोंमेंसे यह किसकी है ?'—ऐसा ब्राह्मणसे पूछा । ब्राह्मणो ब्रूते,— 'वर्णश्रेष्ठो द्विजः पूज्यः क्षत्रियो बलवानपि । धनधान्याधिको वैश्यः शूद्रस्तु द्विजसेवया ॥ २० ॥ ब्राह्मण बोला—'वर्णोंमें श्रेष्ठ होनेसे ब्राह्मण, बली होनेसे क्षत्रिय, अधिक धन- धान्यवान् होनेसे वैश्य और इन तीनों वर्णोंकी सेवासे शूद्र पूज्य होता है ॥२०॥ तद्युवां क्षत्रधर्मानुगौ, युद्ध एव युवयोर्नियमः।' इत्यभिहिते सति 'साधुक्तमनेन' इति कृत्वाऽन्योन्यतुल्यवीर्यौ समकालमन्योन्यघा- तेन विनाशमुपगतौ । अतोऽहं ब्रवीमि—"संधिमिच्छेत् समेनापि" इत्यादि ॥' राजाह—'प्रागेव किं नोक्तं भवद्भिः ?'। मन्त्री ब्रूते—'मद्वचनं किमवसानपर्यन्तं श्रुतं भवद्भिः ? तदापि मम संमत्या नायं विग्रहारम्भः । साधुगुणयुक्तोऽयं हिरण्यगर्भो न विग्राह्यः। गिद्ध बोला—'इसलिये तुम दोनों क्षत्रियधर्म पर चलने वाले होनेसे तुम दोनोंका युद्ध ही नियम है । ऐसा कहते ही "यह इसने अच्छा कहा" यह कह कर समान बल वाले वे दोनों एक ही समय आपसमें लड़ कर मर गये । इसलिये मैं कहता हूँ—"समान बल वाले के साथ भी संधि करनी चाहिये" इत्यादि।' राजा बोला-'तुमने पहलेही क्यों नहीं कहा ?' मंत्रीने कहा-क्या मेरी बात आपने अंत तक सुनी थी ? तोभी मेरी संमतिसे यह युद्ध आरंभ नहीं हुआ है । सुन्दर गुणोंसे युक्त यह हिरण्यगर्भ विरोध करनेके योग्य नहीं है । तथा चोक्तम्,— सत्यार्यौ धार्मिकोऽनार्यो भ्रातृसंघातवान् बली । अनेकयुद्धविजयी संधेयाः सप्त कीर्तिताः ॥ २१ ॥