भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 302 में से

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पृष्ठ 250

२३० हितोपदेशः [ संधिः २२- जैसा कहा है—सत्य बोलने वाला, सज्जन, धर्मशील, दुर्जन, अधिक भाई- बंधु वाला, शूरवीर और अनेक संग्रामोंमें जय पाने वाला ये सात मनुष्य सन्धि करनेके योग्य कहे गये हैं ॥ २१ ॥ सत्योऽनुपालयेत् सत्यं संधितो नैति विक्रियाम् । प्राणबाधेऽपि सुव्यक्तमार्यों नायात्यनार्यताम् ॥ २२ ॥ सत्यभाषी सत्यके अनुसार संधि करके विश्वासघात नहीं करता है, और सज्जन प्राण जाने पर भी प्रत्यक्षमें नीचता नहीं करता है ॥ २२ ॥ धार्मिकस्याभियुक्तस्य सर्व एव हि युध्यते । प्रजानुरागाद्धर्माच्च दुःखोच्छेद्यो हि धार्मिकः ॥ २३ ॥ शत्रुओंसे घिरे हुए धार्मिकके सभी अनुकूल होते हैं इसलिये धर्मसे तथा प्रजाके अनुरागसे धार्मिक राजा दुःखसे जीतनेके योग्य होता है ॥ २३ ॥ संधिः कार्योंऽप्यनार्येण विनाशे समुपस्थिते । विना तस्याश्रयेणार्यों न कुर्यात् कालयापनम् ॥ २४ ॥ विनाश उपस्थित होने पर दुष्टके साथ भी मेल कर लेना चाहिये और उसके आश्रयके विना सज्जनको कालयापन (समय काटना) नहीं करना चाहिये ॥ २४ ॥ संहतत्वाद्यथा वेणुर्निबिडैः कण्टकैर्वृतः । न शक्यते समुच्छेत्तुं भ्रातृसंघातवांस्तथा ॥ २५ ॥ और जैसे बहुतसे काँटोंसे लदा हुआ बाँस आपसमें मिले रहनेसे नहीं कट सकता है वैसे ही भाई-बन्धुओंसे मिला हुआ पुरुष भी नष्ट नहीं हो सकता है २५ बलिना सह योद्धव्यमिति नास्ति निदर्शनम् । प्रतिवातं न हि घनः कदाचिदुपसर्पति ॥ २६ ॥ बली शत्रुके साथ युद्ध करना चाहिये ऐसा उदाहरण नहीं है, क्योंकि बादल पवनके प्रतिकूल कभी नहीं चलता है, अर्थात् जिधरको पवन जाती है उधरको ही चलता है ॥ २६ ॥ जमदग्नेः सुतस्येव सर्वैः सर्वत्र सर्वदा । अनेकयुद्धजयिनः प्रतापादेव भुज्यते ॥ २७ ॥ और जमदग्निके पुत्र अर्थात् परशुरामके समान अनेक युद्धोंमें जीतने वाले राजाके प्रतापसे बहुतसे संग्रामोंमें सब मनुष्य सब स्थानमें सब कालमें पराये राजाको अधिकारमें कर लेते हैं ॥ २७ ॥

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