हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-३२] सन्धिका गुणदोषकथन २३१ अनेकयुद्धविजयी संधानं यस्य गच्छति । तत्प्रतापेन तस्याशु वशमायान्ति शत्रवः ॥ २८ ॥ अनेक संग्रामोंमें जीतने वाला मनुष्य जिस राजासे मेल कर लेता है तो उसके प्रतापसे (जिसके साथ संधि की है) उसके शत्रु शीघ्र वशमें हो जाते हैं ॥२८॥ तत्र तावद्बहुभिर्गुणैरुपेतः संधेयोऽयं राजा।' चक्रवाकोऽवद- त्—'प्रणिधे ! सर्वत्रावव्रज । सर्वमवगतम् । गत्वा पुनरा गमिष्य- सि।' राजा चक्रवाकं पृष्टवान्—'मन्त्रिन् ! असंघेयाः कति तान्श्रोतुमिच्छामि ।' इसलिये अनेक गुणोंसे युक्त यह राजा मेल करनेके योग्य है।' चकवा कहने लगा—'हे दूत ! सब स्थानोंमें जा, तुमने सब समझ लिया है, और जा कर फिर लोट आना।' राजाने चकवेसे पूछा-'हे मंत्री ! कितने मनुष्य संधि करनेके योग्य नहीं हैं, उन्हें सुनना चाहता हूँ।' मन्त्री ब्रूते—'देव ! कथयामि । शृणु,— मंत्री बोला-महाराज ! कहता हूँ सुनिये— बालो वृद्धो दीर्घरोगी तथा ज्ञातिबहिष्कृतः । भीरुको भीरुजनको लुब्धो लुब्धजनस्तथा ॥ २९ ॥ बालक, बूढ़ा, बहुत दिनोंका रोगी और जाति बाहर किया हुआ, डरपोक, भय उत्पन्न करने वाला, लोभी और जिसका लोभी मंत्री हो ॥ २९ ॥ विरक्तप्रकृतिश्चैव विषयेष्वतिसक्तिमान् । अनेकचित्तमन्त्रस्तु देवब्राह्मणनिन्दकः ॥ ३० ॥ और रूठी हुई प्रजा वाला, विषयभोगादिमें आसक्त, अनेकोंके चित्तमें जिसका मंत्र रहे अर्थात् जिसका मंत्र गुप्त न हो, और देवता-ब्राह्मणोंकी निन्दा करने वाला हो ॥ ३० ॥ दैवोपहतकश्चैव तथा दैवपरायणः । दुर्भिक्षव्यसनोपेतो बलव्यसनसंकुलः ॥ ३१ ॥ भाग्यहीन, प्रारब्धकी चिन्ता करने वाला, अकालके दुःखसे दुःखी और सेनाकी पीडासे व्याकुल हो ॥ ३१ ॥ अदेशस्थो बहुरिपुर्युक्तः कालेन यश्च न । सत्यधर्मव्यपेतश्च विंशतिः पुरुषा अमी ॥ ३२ ॥