हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 253, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-४५ ] उन्नतिपथमें अनुचित कृत्यसे हानि २३३ संत्यज्यते प्रकृतिभिर्विरक्तप्रकृतिर्युधि । सुखाभियोज्यो भवति विषयेष्वतिसक्तिमान् ॥ ३९ ॥ बिगड़ी हुई प्रजा वाला ( राजा ) युद्धमें प्रजासे छोड़ दिया जाता है, और जो विषयोंमें अधिक आसक्त होकर रहता है वह सहजहीमें हराया जा सकता है ॥ ३९ ॥ अनेकचित्तमन्त्रस्तु भेद्यो भवति मन्त्रिणा । अनवस्थितचित्तत्वात् कार्यतः स उपेक्ष्यते ॥ ४० ॥ अनेक मनुष्योंसे गुप्त परामर्शको प्रकट करने वालेकी मंत्रीके साथ फूट हो जाती है, और अनवस्थित(डामाडोल) चित्तके कारण कार्यमें मंत्री उसे छोड़ देता है ॥ सदा धर्मबलीयस्त्वाद्देवब्राह्मणनिन्दकः । विशीर्यते स्वयं ह्येष दैवोपहतकस्तथा ॥ ४१ ॥ धर्मके कारण बलवान् होनेसे भी, देवता और ब्राह्मणोंकी निंदा अथवा अवज्ञा करने वाला और प्रारब्धहीन निस्सन्देह अपने आपही नाश हो जाता है ॥४१॥ संपत्तेश्च विपत्तेश्च दैवमेव हि कारणम् । इति दैवपरो ध्यायन् नात्मानमपि चेष्टते ॥ ४२ ॥ संपत्ति और विपत्तिका प्रारब्ध ही कारण है ऐसा सोच कर केवल प्रारब्धको (ही प्रधान) मानने वाला अपने आपको काममें नहीं लगाता है ॥ ४२ ॥ दुर्भिक्षव्यसनी चैव स्वयमेव विषीदति । बलव्यसनयुक्तस्य योद्धुं शक्तिर्न जायते ॥ ४३ ॥ दुर्भिक्षकी पीड़ासे दुखी प्रजा वाला राजा आप ही दुर्बल होता है और पीड़ित सेना वालेको लड़नेकी शक्ति नहीं होती है, अर्थात् नष्ट हो जाती है ॥ ४३ ॥ अदेशस्थो हि रिपुणा स्वल्पकेनापि हन्यते । ग्राहोऽल्पीयानपि जले गजेन्द्रमपि कर्षति ॥ ४४ ॥ पराये राज्यमें रहने वाला राजा थोड़े शत्रुओंसे भी मारा जाता है, क्योंकि जलमें छोटेसे छोटाभी मकर बड़े हाथीको खींच लेता है ॥ ४४ ॥ बहुशत्रुस्तु संत्रस्तः श्येनमध्ये कपोतवत् । येनैव गच्छति पथा तेनैवाशु विपद्यते ॥ ४५ ॥ बहुतसे शत्रु वाला, डरा हुआ मनुष्य, बाज पक्षियोंके मध्यमें कबूतरके समान जिस मार्गसे जाता है उसी मार्गसे दुखी होता है ॥ ४५ ॥