भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

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पृष्ठ 254

२३४ हितोपदेशः [ संधिः ४६- अकालसैन्ययुक्तस्तु हन्यते कालयोधिना । कौशिकेन हतज्योतिर्निशीथ इव वायसः ॥ ४६ ॥ युद्धके अनुचित समयमें सेनासे युक्त भी मनुष्य उचित समय पर लड़ने वालेसे आधी रातमें नहीं दीखनेके कारण उलूकसे मारे हुए कागके समान मारा जाता है ॥ सत्यधर्मव्यपेतेन संदध्यान्न कदाचन । स संधितोऽप्यसाधुत्वादचिराद्याति विक्रियाम् ॥ ४७ ॥ सत्य तथा धर्मरहितके साथ कभी मेल न करना चाहिये, क्योंकि वह संधिके हो जाने पर भी असज्जनताके कारण तुरन्त पलट जाता है ॥ ४७ ॥ अपरमपि कथयामि । संधिविग्रहयानासनसंश्रयद्वैधीभावाः षाड्गु- ण्यम् । कर्मणामारम्भोपायः पुरुषद्रव्यसंपद्देशकालविभागो विनि- पातप्रतीकारः कार्यसिद्धिश्च पञ्चाङ्गो मन्त्रः । सामदानभेददण्डा- श्चत्वार उपायाः । उत्साहशक्तिर्मन्त्रशक्तिः प्रभुशक्तिश्चेति शक्ति- त्रयम् । एतत्सर्वमालोच्य नित्यं विजिगीषवो भवन्ति महान्तः । और भी कहता हूँ—संधि (मैत्रीभाव), विग्रह (युद्ध), यान (यात्रा), आसन (समय देखना), संश्रय (आश्रय लेना), द्वैधीभाव (छल), ये छः गुण हैं और कर्मोंके आरंभका यत्न, पुरुष और द्रव्यका संग्रह, देशकालका विभाग और विनिपातप्रतीकार (आपत्तिका दूर करना), कार्यसिद्धि ये पाँच विचारके अंग हैं । साम, दान, भेद, दंड ये चार उपाय हैं और उत्साहशक्ति, मन्त्रशक्ति और प्रभुशक्ति ये तीन शक्तियाँ हैं । इन सबको विचार कर बड़े पुरुष जीतनेकी इच्छा करने वाले होते हैं ॥ या हि प्राणपरित्यागमूल्येनापि न लभ्यते । सा श्रीर्नीतिविदं पश्य चञ्चलापि प्रधावति ॥ ४८ ॥ जो लक्ष्मी प्राणत्यागरूपी मोलसे भी नहीं मिलती है वह लक्ष्मी चंचला होनेसे भी नीति जानने वालोंके घर दौड़ती है, अर्थात् उनके वहाँ निवास करती है ॥ ४८ ॥ तथा चोक्तम् ,— जैसा कहा है,—