भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

-५० ] राजा का सन्धि करने में हठ २३५ वित्तं यदा यस्य समं विभक्तं गूढश्चरः संनिभृतश्च मन्त्रः । न चाप्रियं प्राणिषु यो ब्रवीति स सागरान्तां पृथिवीं प्रशास्ति ॥ ४९ ॥ जिसका धन बराबर बाँट दिया गया है, तथा दूत गुप्त है, और मंत्र प्रका- शित नहीं है, और जो प्राणियोंसे अप्रिय (कटु) वचन नहीं बोलता है वह समुद्रपर्यन्त पृथिवीका राज्य करता है अर्थात् चक्रवर्ती राजा हो जाता है ॥४९॥ किंतु यद्यपि महामन्त्रिणा गृध्रेण संधानमुपन्यस्तं तथापि तेन राज्ञा संप्रति भूतजयदर्पान्न मन्तव्यम् । देव ! तदेवं क्रियताम् । सिंहलद्वीपस्य महाबलो नाम सारसो राजाऽस्मन्मित्रं जम्बुद्वीपे कोपं जनयतु । परन्तु यद्यपि महामंत्री गिद्धने संधि करनेका आरंभ किया है तोभी वह राजा विजय होनेके घमंडसे अब नहीं मानता है, इसलिये महाराज ! ऐसा कीजिये कि सिंहलद्वीपका राजा महाबल नाम सारस हमारा मित्र जम्बूद्वीप पर कोप करे । यतः,— सुगुप्तिमाधाय सुसंहतेन बलेन वीरो विचरन्नरातिम् । संतापयेद्येन समं सुतप्त- स्तप्तेन संधानमुपैति तप्तः ॥ ५० ॥ क्योंकि—वीर, बड़े गुप्त प्रकारसे अनुरक्त सेनाके द्वारा शत्रुको घेर कर पीड़ा दे कि जिस पीड़ासे वह समान तप्ता अर्थात् उग्र हो जाय, क्योंकि तप्ता तत्तेके साथ मिल जाता है, अर्थात् तुल्य पराक्रम वाला सहजमें मिला लिया जाता है ॥ ५० ॥ राज्ञा 'एवमस्तु' इति निगद्य विचित्रनामा बकः सुगुप्तलेखं दत्त्वा सिंहलद्वीपं प्रहितः । राजाने 'बहुत अच्छा' ऐसा कह कर विचित्र नाम बगुलेको गुप्त चिट्ठी दे कर सिंहलद्वीपको भेज दिया ।