हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 26, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें६ हितोपदेशः [ प्रस्ताविका २४- अभ्यास न करनेसे विद्या, अजीर्ण होने पर भोजन, दरिद्रीको सभा और बूढेको तरुण स्त्री, विषके समान है ॥ २३ ॥ यस्य कस्य प्रसूतोऽपि गुणवान् पूज्यते नरः । धनुर्वंशविशुद्धोऽपि निर्गुणः किं करिष्यति ? ॥ २४ ॥ किसीसेभी उत्पन्न हुआ हो, किन्तु गुणवान् होनेसे प्रतिष्ठा पाता है; जैसे अच्छे बांसका बना हुआभी धनुष्य गुण अर्थात् डोरीके बिना क्या कर सकता है ? ॥ २४ ॥ तत्कथमिदानीमेते मम पुत्रा गुणवन्तः क्रियन्ताम् । आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ २५ ॥ इसलिये अब किसी प्रकारसे, इन मेरे पुत्रोंको गुणवान् कीजिये. आहार, निद्रा, भय और मैथुन, ये पशुओं और मनुष्योंमें समान हैं, केवल मनुष्योंमें धर्मही अधिक है और धर्महीन मनुष्य पशुके समान है ॥ २५ ॥ यतः,— धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते । अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥ २६ ॥ क्योंकि-जिस मनुष्यमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इनमेंसे एक भी न हो, उसका जन्म बकरीके गलेके थनके समान वृथा ( निकम्मा ) है ॥ २६ ॥ यच्चोच्यते,— आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च । पञ्चैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥ २७ ॥ जैसा कहा जाता है कि-आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु, ये पांच बातें मनुष्यकी गर्भहीमें लागू होती हैं ॥ २७ ॥ १ ज्ञान-दरिद्र ( मूर्ख ) या धनजानको. २ धर्मादि चार पुरुषार्थके उपाय.