हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-३२ ] दैव और प्रयत्नकी समीक्षा ७ किंच,— अवश्यंभाविनो भावा भवन्ति महतामपि । नग्नत्वं नीलकण्ठस्य महाहिशयनं हरेः ॥ २८ ॥ और, अवश्य होनहार विषय बड़े ( देवों ) कोभी होते हैं जैसे महादेवजीको नग्नता और विष्णुका शेषनागपर लोटना ॥ २८ ॥ अपि च,— यदभावि न तद्भावि, भावि चेन्न तदन्यथा । इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगदः किं न पीयते ? ॥ २९ ॥ और, जो होनहार नहीं है सो कभी न होगा और जो होनहार है उससे विपरीत न होगा, अर्थात् अवश्य होगा—इस चिन्तारूपी विषको नाश करने वाले औषधको क्यों नहीं पीते ? ॥ २९ ॥ एतत्का्र्याक्षमाणां केषांचिदालस्यवचनम् । न दैवमपि संचिन्त्य त्यजेदुद्योगमात्मनः । अनुद्योगेन कस्तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुमर्हति ? ॥ ३० ॥ यह तो कितनेही, कार्य करनेमें असमर्थोंका आलस्ययुक्त वचन है । भाग्यको विचार कर ( केवल दैवके उपरही भरोसा रख कर ) ही मनुष्यको अपना उद्योग नहीं छोडना चाहिये, क्योंकि विना उद्योगके तिलोंमेंसे तेल कौन निकाल सकता है ? ॥ ३० ॥ अन्यच्च,— उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी- 'दैवेन देय'मिति कापुरुषा वदन्ति । दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या, यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ? ॥ ३१ ॥ और भी, उद्योगी-जो पुरुषोंमें सिंहके समान पराक्रमी है ऐसे श्रेष्ठ मनुष्यको लक्ष्मी मिलती है और 'भाग्यमें होगा सो मिलेगा' इस प्रकार पुरुषार्थहीन मनुष्य कहते हैं; इसलिये भाग्यको छोड़, यथाशक्ति यत्न करना चाहिये और यत्न करनेपर भी जो कार्य सिद्ध न हो तो उसमें क्या दोष है ? ॥ ३१ ॥ यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् । एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥ ३२ ॥