भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 280

केवल उपहार अर्थात् भेटही एक उपहार संधि है, यही मुझे संमत है, और उपहारसे भिन्न अन्य सब प्रकारकी संधियां मित्रतासे रहित है ॥ १२५ ॥ अभियोक्ता बलियस्त्वादलब्ध्वा न निवर्तते । उपहाराहृते तस्मात् संधिरन्यो न विद्यते' ॥ १२६ ॥ और चढ़ाई करके युद्धके लिये आने वाला शत्रु बलवान् होनेसे थोड़ाभी धन बिना लिये नहीं लौटता है इसलिये उपहारको छोड़ दूसरे प्रकारकी संधि नहीं है' ॥ १२६ ॥ राजाह—'भवन्तो महान्तः पण्डिताश्च । तदत्रास्माकं यथा- कार्यमुपदिश्यताम् ।' मन्त्री ब्रूते—'आः ! किमेवमुच्यते ? । राजा बोला—'आप लोग तो बड़े पण्डित हैं । इसलिये हमको जो करना चाहिये सो आज्ञा कीजिये ।' मंत्री बोला—'अजी ! आप क्या कहते हैं ? । आधिव्याधिपरीतापाद्य श्वो वा विनाशिने । को हि नाम शरीराय धर्मापेतं समाचरेत् ? ॥ १२७ ॥ मनका संताप, रोग और पुत्रादिक वियोगसे उत्पन्न हुआ क्लेश इनसे आज अथवा कल याने किसीभी क्षणमें विनाश पाने वाले शरीरके लिये कौनसा मनुष्य धर्मरहित आचरण करेगा ? ॥ १२७ ॥ जलान्तश्चन्द्रचपलं जीवितं खलु देहिनाम् । तथाविधमिति ज्ञात्वा शश्वत् कल्याणमाचरेत् ॥१२८॥ देहधारियोंका जीवन निश्चय करके पानीमें दिखनेवाले चन्द्रमाका प्रतिबिंबके समान चंचल है ऐसा इसे जान कर सर्वदा कल्याणका आचरण करना चाहिये ॥ १२८ ॥ मृगतृष्णासमं वीक्ष्य संसारं क्षणभङ्गुरम् । सञ्जनैः संगतं कुर्याद्धर्माय च सुखाय च ॥ १२९ ॥ मृगतृष्णाके समान क्षणभंगुर संसारको विचार कर धर्म और सुखके लिये सज्जनोंके संग मेल करना चाहिये ॥ १२९ ॥ तन्मम संमतेन तदेव क्रियताम् । इसलिये मेरी समझसे वही करिये । यतः,— अश्वमेधसहस्राणि सत्यं च तुलया कृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेवातिरिच्यते ॥ १३० ॥