हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 281, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-१३० ] राजपुत्रोंका राजनीतिको समझ जाना २६१ क्योंकि—सहस्र अश्वमेध यज्ञ और सत्य, तराजूमें रख कर तोले गये तो सचमुच सहस्र अश्वमेधसे सत्यहीका पलड़ा भारी रहा ॥ १३० ॥ अतः सत्याभिधानदिव्यपुरःसरमप्यनयोर्भूकालयोः काञ्चनाभि- धानसंधिर्विधीयताम् ।' सर्वज्ञो ब्रूते—'एवमस्तु ।' ततो राज- हंसेन राज्ञा वस्त्रालंकारोपहारैः स मन्त्री दूरदर्शी पूजितः, प्रहृष्ट- मनाश्चक्रवाकं गृहीत्वा राज्ञो मयूरस्य संनिधानं गतः । तत्र चित्र- वर्णेन राज्ञा सर्वज्ञो गृध्रवचनाद्बहुमानदारपुरःसरं संभाषितस्त- थाविधं संधिं स्वीकृत्य राजहंससमीपं प्रस्थापितः । दूरदर्शी ब्रूते—'देव ! सिद्धं नः समीहितम् । इदानीं स्वस्थानमेव विन्ध्या- चलं व्यावृत्त्य प्रतिगम्यताम् । अथ सर्वे स्वस्थानं प्राप्य मनोभि- लषितं फलं प्राप्नुवन्त्विति । इसलिये सत्य वचनको स्वीकार करके इन दोनों राजाओंको कांचन नाम संधि करनी चाहिये.' सर्वज्ञ बोला—'यही ठीक है.' फिर राजहंसराजाने वस्त्र और अलंकारोंकी भेटसे उस मंत्री दूरदर्शीका सत्कार किया. और वह प्रसन्नचित्त हो कर चक्रवाकको ले कर राजा मयूरके पास गया. और वहां गिद्धके वचनसे चित्रवर्ण राजा बड़े आदरसत्कारपूर्वक सर्वज्ञसे बोल और उसी प्रकारकी अर्थात् कांचननाम संधिको स्वीकार करके राजहंससे बिदा हुआ। दूरदर्शी बोला—'महाराज ! हमारा मनोरथ सिद्ध हुआ, अब अपने स्थान विंध्याचलकोही लोट कर चलना चाहिये. फिर सभीने अपने अपने स्थान पर पहुंच कर मनोवांछित फल पाया. विष्णुशर्मणोक्तम्—'अपरं किं कथयामि ? कथ्यताम् ।' राजपुत्रा ऊचुः—'तव प्रसादाद्राज्यव्यवहाराङ्गं ज्ञातम् । ततः सुखिनो भूता वयम् ।' विष्णुशर्माने कहा—'और क्या कहूं ? कहिये ।' राजपुत्र बोले—'आपके प्रसादसे राज्यके व्यवहारका अंग ( राजनीति ) जाना । और उसीसे हम सुखी हुये । विष्णुशर्मोवाच—'यद्यप्येवं तथाप्यपरमपीदमस्तु,— तब विष्णुशर्मा बोले—'यद्यपि ऐसा है तथापि यह और हो,—