भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

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२६२ हितोपदेशः [ संधिः १३१- संधिः सर्वमहीभुजां विजयिनामस्तु प्रमोदः सदा सन्तः सन्तु निरापदः सुकृतिनां कीर्तिश्चिरं वर्धताम् । नीतिर्वारविलासिनीव सततं वक्षःस्थले संस्थिता वक्त्रं चुम्बतु मन्त्रिणामहरहर्भूयान्महानुत्सवः'॥ १३१॥ विजयशील राजाओंको संधि सदा प्रसन्न करने वाली हो, सज्जन मनुष्य विपत्तिरहित हों, सत्कर्म करने वालोंका यश बहुत काल तक बढ़े, नीति वेश्याके समान सर्वदा मन्त्रियोंके हृदय पर शोभायमान रह कर मुखचुम्बन करती रहे अर्थात् मुख और हृदयमें निवास करे और प्रतिदिन अधिक आनन्द हो ॥१३१॥ अन्यच्चास्तु,— यह और भी हो कि,— प्रालेयाद्रेः सुतायाः प्रणयनिवसतिश्चन्द्रमौलिः स याव- द्यावलक्ष्मीर्मुरारेर्जलद इव तडिन्मानसे विस्फुरन्ती। यावत् स्वर्णाचलोऽयं दवदहनसमो यस्य सूर्यः स्फुलिङ्ग- स्तावन्नारायणेन प्रचरतु रचितः संग्रहोऽयं कथानाम् ॥१३२॥ जब तक चन्द्रशेखर महादेवजी हिमाचलकी कन्या पार्वतीजीके साथ स्नेहपूर्वक बसें, जब तक मेघमें बिजलीके समान श्रीविष्णु भगवान्के हृदयमें लक्ष्मी निवास करे, और जब तक जिसके चिनगारीके समान सूर्य है ऐसा दावानलके समान मेरु पर्वत स्थित रहे तब तक नारायणपण्डितका बनाया हुआ यह कथाओंका संग्रह प्रचलित रहे ॥ १३२ ॥ अपरं च,— श्रीमान् धवलचन्द्रोऽसौ जीयात् माण्डलिको रिपून् । येनायं संग्रहो यत्नाल्लेखयित्वा प्रचारितः ॥ १३३ ॥ और यह चक्रवर्ती श्रीमान् राजा धवलचन्द्र शत्रुओंको पराजित करें, कि जिन्होंने यह संग्रह यत्न पूर्वक लिखवा कर प्रचार किया ॥ १३३ ॥ इति ॥ पं० रामेश्वरभट्टका किया हुआ हितोपदेशग्रंथके संधिप्रकरण चतुर्थ भागका भाषा अनुवाद समाप्त हुआ. शुभम्. समाप्तोऽयं हितोपदेशः।